एक अनार – दो बीमार

अदाकार ग्रुप की हास्य-प्रधान सफल नाट्य प्रस्तुति

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review01सहारनपुर – प्रसिद्ध रंगकर्मी एवं निर्देशक जावेद खान सरोहा द्वारा निर्देशित ’अदाकार ग्रुप’ की  नवीनतम रंगमंच प्रस्तुति ’एक अनार – दो बीमार’ एक हल्का फुल्का हास्य नाटक है जिसे अदाकार के रंगकर्मियों ने अपनी विशिष्ट प्रतिभा के बल पर एक उल्लेखनीय प्रस्तुति बना दिया है। जनमंच, सहारनपुर में नगर निगम सहारनपुर के सहयोग से मंचित इस नाटक की कहानी एक ऐसे मकान में रहने वाले दो नौकरों के इर्द गिर्द घूमती है, जो अपने मकान मालिक की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए एक युवती व एक युवक को किराये पर कमरा दे देते हैं। युवक और युवती के अपने अपने ऑफिस जाने – आने के समय अलग-अलग होने के कारण उनको यह आभास नहीं होता कि उनके कमरे में उनकी अनुपस्थिति में कोई और व्यक्ति भी रहता है। दोनों नौकरों के भरसक प्रयास के बावजूद धीरे – धीरे इन दोनों किरायेदारों को शक होने लगता है कि उनके कमरे में कोई और भी आता – जाता है। सारी हास्य जनक परिस्थितियां इन्हीं सारे प्रयासों से उपजती हैं जो दर्शकों को गुदगुदाती रहती हैं। जितना अधिक इन दोनों नौकरों ( प्रीतम और बालम) और दोनों किरायेदारों (नीलेश और मंजू) की परेशानियां बढ़ती जाती हैं, उतना ही अधिक दर्शक हंसते – हंसते लोटपोट होते रहते हैं।

review03प्रीतम की भूमिका में राहुल त्रिपाठी और बालम की भूमिका में अंकुश जोशी नाटक के प्रमुख आकर्षण रहे हैं। वहीं वृत्तिका वर्मा ने मंजू तथा समर खान ने नीलेश की भूमिका का सफल निर्वाह किया है। इन चार मुख्य पात्रों के अतिरिक्त कुछ सहायक पात्र भी आते जाते रहते हैं – जैसे सेठ बद्री प्रसाद (जावेद कुरेशी, कुरियर (मधुर पाहुजा), सरदार मित्र (शानू सिद्दकी) भूत-प्रेत भगाने वाला (आनन्द सौदाई), भूत (राहुल त्रिपाठी) आदि। नाटक में संगीत अमित कौशिक ने दिया जो हास्य परिस्थितियों के बहुत अनुकूल रहा। वरिष्ठ रंगकर्मी विक्रान्त जैन ने पार्श्वगायक के रूप में अंकुश जोशी को अपनी आवाज़ भी दी। मंच सामग्री की व्यवस्था हास्य अभिनेता व उद्घोषक के रूप में अपनी पहचान बना चुके रंगकर्मी संदीप शर्मा ने संभाली जिसमें टीना शर्मा ने वस्त्र विन्यास का उत्तरदायित्व उठाते हुए भरपूर सहयोग दिया। सैट सजाने में शानू सिद्दकी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इस प्रस्तुति की तकनीकी कमज़ोरियों का ज़िक्र करें तो ध्वनि व्यवस्था सही न होने के कारण दर्शकों तक संवाद ठीक से न पहुंच पाना सबसे बड़ी कमी रही। मेरे व्यक्तिगत विचार में कुछ पात्र हास्य की उम्मीद में जबरदस्ती शामिल किये गये हैं जबकि वह सिर्फ नाटक को लंबा खींचते हैं। शानू सिद्दकी और आनन्द सौदाई ने अपना काम बखूबी किया परन्तु उनकी जरूरत ही नहीं थी। संभवतः निर्देशक ने दर्शकों में मौजूद छोटे छोटे बच्चों को हंसाने के लिये यह भूमिकाएं जोड़ दी हों। नीलेश की भूमिका में आये समर खान बहुत जंचते हैं परन्तु उनको अपनी संवाद अदायगी में और परिपक्वता लाने की जरूरत है। सेठ बद्री प्रसाद का किरदार निभा रहे कलाकार को अनावश्यक रूप से लाठी थमा दी गई जबकि वह पूरे तन कर चल रहे थे। संभवतः निर्देशक इस कलाकार को समझा ही नहीं पाये कि लाठी हाथ में लेने के बाद किस प्रकार चलना चाहिये।

परम्परागत रूप से भारतीय साहित्य में व्यंग्य तो यदा कदा दृष्टिगोचर होता है, किन्तु शुद्ध हास्य कम ही देखने को मिलता है। विकृति से हास्य का जन्म होता है, इस अवधारणा पर चलते हुए भारतीय नाट्य परंपरा में हास्य को विशेष महत्व नहीं दिया गया है। दो-तीन दशक पहले तक की हिन्दी फिल्मों व नाटकों में भी एक पुरुष और एक महिला को सहायक भूमिका देते हुए उनसे मूर्खतापूर्ण और ऊटपटांग हरकतें कराते हुए कहानी में हास्य का पुट डालने की कोशिश की जाती रही है। जॉनी वाकर, महमूद, राजेन्द्र नाथ, टुनटुन आदि कलाकारों को ऐसी ही भूमिकाएं मिलती रही हैं। गुलज़ार और हृषिकेश मुखर्जी जैसे फिल्मकारों ने जब कहानी के नायक व नायिका से हास्य की अपेक्षा करनी शुरु की तो स्थिति में परिवर्तन आया है। अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना और संजीव कुमार, देवेन वर्मा आदि ने अनेकानेक ऐसी सफल भूमिकाएं निभाई हैं जिनमें हास्य की प्रधानता रही। यह नाटक इस नयी व पुरानी परम्परा का सम्मिश्रण प्रस्तुत करता है।

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