एक्सीडेंट

लोकप्रिय कथाकार कश्मीर सिंह की कलम से निकली एक मर्मस्पर्शी कहानी

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accidentकश्मीर सिंह

कड़ाके की सर्दी से पगलाये कोहरे ने ताल ठोक कर सूर्य के साम्राज्य को चुनौती दे रखी थी। वीणा को वीमेंस कालेज में प्राचार्य पद हेतु साक्षात्कार के लिए दस बजे तक पहुँचना था लेकिन घर से निकलते-निकलते ही उसे सवा नौ बज गए थे। घर से निकली तो कोहरे के आर-पार कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। नजदीक का रिक्शा स्टैण्ड सुनसान पड़ा था। अब इसे गरीबी में आटा गीला न कहें तो और क्या कहें ? पहले तो घर से निकलने में ही देर हो गई, ऊपर से कोई रिक्शेवाला भी नजर नहीं आया। वह पैदल ही कालेज के लिए चल पड़ी। कोहरा था कि छँटने का नाम नहीं ले रहा था। वीणा कभी घड़ी देखती तो कभी नजर इधर-उधर दौड़ाती कि शायद बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाए और कोई सवारी कहीं से निकल आए।

कालेज अभी लगभग आधा किलोमीटर ही दूर रहा होगा कि उसकी बगल से एक सफेद कार सूँउउऊ करती निकली। वह दो-चार कदम ही चली थी कि एक जोर का धमाका हुआ। धमाका इतना तेज था कि किसी दुर्घटना के सन्देह में वीणा उसी ओर दौड़ पड़ी। वीणा का सन्देह ठीक ही निकला। वही सफेद कार पुलिया के पास यूकेलिप्टिस के पेड़ से टकराकर उल्टी पड़ी थी। वीणा कार के समीप गई, झाँक कर देखा तो सत्रह-अठारह वर्ष का एक नवयुवक, खून से लथपथ, कार के स्टीयरिंग के बीच फँसा था। वीणा ने कार का दरवाजा खोलने की पूरी कोशिश की लेकिन सफल न हो सकी, वह दौड़कर सड़क पर आई और मदद के लिए पुकारने लगी। आस-पास के मकानों से निकलकर इकट्ठा हो गए लोगों ने बड़ी मुश्किल से युवक को कार से बाहर निकाला। युवक का सिर फट जाने से बर्फ जमाऊ सर्दी में भी खून तेजी से बह रहा था, वीणा ने अपने पर्स से रुमाल निकालकर युवक के फटे सिर पर रखा और अपने स्कार्फ से कसकर बाँध दिया ताकि खून का बहना बन्द हो सके। कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त होने से डैश बोर्ड़ में बना पेपर रखने का बाक्स भी पिचक गया था। ढूंढने पर कार में से एक भी चीज ऐसी नहीं मिली जिससे कि युवक की पहचान हो पाती तथा उसके परिजनों को कोई सूचना दी जा सकती। युवक की इतनी गम्भीर हालत के बावजूद भी भीड़ में से कोई भी उसे अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं हुआ। सब पुलिस को फोन करने की बात करते रहे। युवक का बुरा हाल देख वीणा बहुत चिन्तित थी, उसने सभी से युवक को अस्पताल ले जाने का अनुरोध किया, लेकिन लोग इसे फालतू का लफड़ा समझ कन्नी काट रहे थे।

वीणा को लोगों की इस घृणित एवम् संकुचित मानसिकता पर बड़ा गुस्सा आ रहा था, वह जोर से चीखी, “आप लोगों के अन्दर का इन्सान मर गया है क्या? जानवर हो गए हो सब, किस पुलिस की बात करते हो?, उसकी, जो सूचना मिलने के बाद भी घंटों तक घटना स्थल पर नहीं पहुँचती । पुलिस जब तक आएगी, इसके प्राण पखेरू उड़ चुके होंगे और पुलिस वाले इसे लावारिस घोषित कर इसका पंचनामा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देंगे। मैं पूछती हूँ, यदि यह आपमें से किसी का बेटा, किसी का भाई या किसी का रिश्तेदार होता तो भी क्या इसी तरह तमाशा देखते रहते आप ?”, कहते-कहते वह लगभग रो ही पड़ी। वीणा की इस करुण पुकार का असर एक व्यक्ति पर कुछ ऐसा हुआ कि वह दौड़कर अपनी कार ले आया, लेकिन पीछे-पीछे उसकी पत्नी भी आ धमकी और चीखते हुए बोली, “पागल हो गए हो क्या ? क्यों पड़ रहे हो इस झमेले में, पुलिस को नहीं जानते क्या?, रस्सी का साँप बना देगी और हमें लेने के देने पड़ जाएंगे।“ परन्तु उस व्यक्ति में अभी थोड़ी सी मानवता शेष थी, उसने अपनी पत्नी को समझाया और युवक को पिछली सीट पर डाल लिया। वीणा के अलावा भीड़ में से एक भी व्यक्ति उसके साथ न आया। कार अस्पताल की तरफ तेजी से दौड़ रही थी। वीणा ने कार वाले सज्जन को धन्यवाद देते हुए कहा, “ यदि आज आप न होते तो यह युवक तो बस ……” उस व्यक्ति ने वीणा को बीच ही में टोकते हुए कहा, “मैडम, मुझे और शर्मिन्दा न करें, कुछ देर के लिए भीड़ के साथ मेरा जमीर भी मर गया था। यह तो आपकी संवेदनाओं ने मेरे जमीर को झकझोर दिया, इसके लिए मैं स्वयं ही आपका आभारी हूँ। मेरा नाम आदित्य है, और यहीं एक बैंक में प्रबन्धक हूँ।”

अस्पताल आ गया और कार इमरजेंसी वार्ड़ के सामने रुक गयी। वार्ड़ के बाहर-भीतर काफी भीड़ जमा थी। पूछने पर पता चला कि किसी मन्त्री जी के रिश्तेदार को गोली लगी थी। भीड़ को चीरती हुई वीणा किसी तरह काउण्टर तक पहुँची और नर्स से डाक्टर के बारे में पूछा। नर्स ने बताया कि दोनों डाक्टर मन्त्री जी के रिश्तेदार का आपरेशन कर रहे हैं। वीणा ने युवक के एक्सीडैण्ट में घायल होने और उसकी चिन्ताजनक स्थिति के बारे में नर्स को बताया। एक्सीडैण्ट का नाम सुनते ही नर्स बोली, “अरे ! फिर तो यह पुलिस केस है, पुलिस को सूचना दे दी क्या? “देखिए, युवक का खून बहुत बह गया है, इस समय उसे पुलिस की नहीं, डाक्टर की जरूरत है, आप कृपा करके फोरन डाक्टर को बुलाइए और युवक को भर्ती कर लीजिए।” वीणा गिड़गिड़ाते हुए बोली। नर्स ने वीणा की एक न सुनी, फोन का रिसीवर उठाया और नजदीकी थाने में सूचना दे दी। नर्स के इस व्यवहार से वीणा को भारी आघात लगा। एक स्त्री, वह भी नर्स, वीणा को कम से कम उससे ऐसे व्यवहार की आशा न थी। काफी प्रतीक्षा के बाद भी न तो पुलिस ही आई और न डाक्टर ही। घड़ी की सुई जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी वीणा का आक्रोश भी वैसे-वैसे ही बढ़ता जा रहा था। इससे पहले कि वीणा के धैर्य का बान्ध टूटता, उसने नर्स का कन्धा पकड़ कर झिंझोड़ा और बोली “डाक्टर को बुलाती हो या मैं ही आपरेशन थियेटर में जाऊँ ?” वीणा की आवाज इतनी तेज थी कि आवाज सुनकर डाक्टर भी आपरेशन थिएटर से बाहर निकल आया और धमकाते हुए बोला, “क्या तमाशा बना रखा है? यह अस्पताल है, अप्पूघर नहीं ? कौन हैं आप, और क्यों चिल्ला रही हैं? डाक्टर की धमकी भरी आवाज से वातावरण एकदम शान्त हो गया था।

‘‘मैं भी यही पूछती हूँ डाॅक्टर साहब यह अस्पताल ही है या कोई बूचड़खाना ? वीणा ने जवाब दिया।“

“कहना क्या चाहती हैं आप ?’’ डाॅक्टर ने पूछा।

वीणा कार की ओर इशारा करते हुए बोली ”पिछले डेढ़ घण्टे से एक युवक जीवन और मृत्यु से जूझ रहा है लेकिन यहाँ आपके किसी स्टाफ को इसकी परवाह ही नहीं, कोई जिये या मरे, आप की बला से !”

डाॅक्टर ने नर्स से पूछा ‘‘क्या मामला है इनका?’’

‘‘सर, पुलिस केस है, मैंने थाने में सूचना दे दी है’’, डाॅक्टर ने वीणा की ओर मुड़ते हुए पूछा “क्या लगता है वो आपका ?” “कोई नहीं” वीणा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“कोई नहीं ?, तो फिर क्यों अस्पताल सिर पर उठा रखा है ? आपके चिल्लाने से हम कानून तो अपने हाथ में नहीं ले सकते ? देखिए, आप कृपा करके शान्त रहिए, पुलिस आती ही होगी, उसके आने पर ही हम इसका इलाज शुरु कर सकेंगे।”

तभी पुलिस की जीप वार्ड़ के सामने रुकी। इंस्पैक्टर ने डाॅक्टर से हाथ मिलाते हुए पूछा “कहिए डाॅक्टर साहब कैसे याद किया?”, वीणा बीच में ही बोल पड़ी, “सर, बाहर कार में एक युवक घायल पड़ा है, उसकी हालत बहुत खराब है, प्लीज उसका इलाज जल्दी करवाइए, इन लोगों ने तो उस बेचारे कोे यूँ ही मर जाने के लिए छोड़ दिया है।”

“आपकी तारीफ ?” ”प्रोफेसर वीणा, गवर्नमैंट कन्या महाविद्यालय में लेक्चरर हूँ।“ “इस युवक की क्या लगती हैं आप ?“

“कोई नहीं।” इन्स्पैक्टर ने युवक का नाम, पता और एक के बाद एक न जाने कितने सवाल दाग दिए जिनके उत्तर वीणा के पास नहीं थे। अन्त में इंस्पैक्टर ने पूछा “एक्सीडेण्ट कहाँ और कैसे हुआ ?”

“महाविद्यालय से थोड़ा पहले पुलिया के पास यूकेलिप्टिस के पेड़ से टकराकर“ वीणा ने बताया।

आप अकेली इसे यहाँ लायी हैं?, “जी नहीं, मिस्टर आदित्य ने मेरा साथ दिया।” आदित्य की ओर इशारा करते हुए वीणा ने बताया ।

इंस्पैक्टर कुछ सोचते हुए आदित्य की कार के पास आया, और आदित्य से पूछा, “कहाँ से आ रहे थे आप?“

”मैं समझा नहीं इंस्पैक्टर साहब“ आदित्य ने कहा। ”क्या कहा, समझा नहीं !, हिन्दी में समझाऊँ क्या? दो-चार हाथ पड़ेंगे तो सब समझ में आ जाएगा। सीधे-सीधे बता कि एक्सीडेण्ट कैसे हुआ?” इंस्पैक्टर ने पुलिसिया अन्दाज में आदित्य पर रौब झाड़ना चाहा।

आदित्य को इंस्पैक्टर के व्यवहार पर कतई भी हैरानी नहीं हुई, उसने इंस्पैक्टर को उसी लहजे में जवाब दिया, “पहले, आप तमीज से बात कीजिए, मैं कोई ऐरा-गैरा नहीं हूँ , बैंक का मैनेजर हूँ , और हाँ एक्सीडेण्ट कैसे हुआ? मुझे मालूम नहीं, मैं तो सड़क पर हो रहे शोर को सुनकर घर से बाहर आया था, वहाँ आकर देखा तो इस युवक की कार उल्टी पड़ी थी, इन मैडम के कहने पर मैं इसे अपनी गाड़ी में डालकर यहाँ ले आया। बस, यही अपराध किया है मैंने।”

इंस्पैक्टर फिर गरजा, “बैंक मैनेजर है तो क्या सबको कुचलकर मार डालने का लाइसेन्स मिल गया है , कार में पड़ा ये डैण्ट इस बात का सबूत है कि तेरी ही कार की टक्कर लगने से युवक का हाथ बहका और कार पेड़ से जा टकराई।”

वीणा ने इंस्पैक्टर को टोकते हुए कहा, “इंस्पैक्टर साहब आदित्य ठीक कह रहे हैं।“ इस एक्सीडैण्ट से इनका कोई लेना-देना नहीं है। उस समय ये वहाँ नहीं थे।”

“मुझे पढ़ाने की कोशिश मत करो मैडम, मैं इन जैसे लोगों की रग-रग को पहचानता हूँ , पहले एक्सीडैण्ट करते हैं, फिर अपना जुर्म छिपाने और अपने आपको हीरो साबित करने के लिए उसे अस्पताल में भर्ती कर रफुचक्कर हो जाते हैं।” इन्स्पैक्टर ने आदित्य को लगभग अपराधी ठहरा दिया। इंस्पैक्टर की अभद्रता से आदित्य का खून खौलने लगा, गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया, उसने भी इंस्पैक्टर को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “ठीक कहते हैं आप, आप जैसे गैर जिम्मेदार पुलिस वालों की वजह से ही 90 परसैण्ट घायल लोग दुर्घटना स्थल पर ही दम तोड़ देते हैं। यदि कोई भला आदमी घायलों को अस्पताल लाने की गलती करता भी है तो आप जैसे पुलिसवाले उन्हें ही मुजरिम बनाने पर जुट जाते हैं ऐसे गैर जिम्मेदार लोगों की वजह से ही पुलिस विभाग कलंकित हो रहा है और आम आदमी का पुलिस पर से भरोसा ही उठता गया है।

“वीणा जी, मेरी पत्नी ठीक ही कह रही थी कि रस्सी का साँप बनाना तो कोई इन्हीं से सीखे।” इंस्पैक्टर का हाल घायल शेर जैसा था, उसने डाक्टर से कहा, “आप इस युवक को ले जाइये और इसका इलाज कराइये। मैं इसे थाने ले जाकर इसका इलाज करता हूँ। बड़ा भाषण झाड़ता है, सारे भाषण भुला दूँगा, लगता है असली पुलिस वालों का पाला नहीं पड़ा अभी तक, चल थाने।”

इंस्पैक्टर के इशारे पर सिपाहियों ने आदित्य को धकियाते हुए जीप में बैठा लिया। वीणा भी आदित्य के साथ जीप में बैठ ली। अस्पतालकर्मियों ने युवक को कार से बाहर निकालकर जैसे ही स्ट्रैचर पर लिटाया तो युवक का चेहरा देखते ही डाक्टर के होश उड़ गए, डाक्टर जोर से चिल्लाया, “अरे! यह तो मेरा बेटा आशु है। जल्दी से इसे अन्दर ले चलो। हे ईश्वर ! मैंने यह क्या किया?“ क्या कमाल हैं, अपने लिए न पुलिस और न कानून थोड़ी ही देर में आशु का इलाज युद्ध स्तर पर शुरू हो गया। थाने की ओर जाते समय ही आदित्य ने अपने मोबाइल से अपने पडौसी शर्मा जी को इंस्पैक्टर द्वारा किए गए दुर्व्यवहार तथा उसे थाने ले जाने की सूचना दे दी थी। जीप के थाने पहुँचते ही इन्स्पैक्टर ने आदित्य को लाक-अप में डाल दिया । शर्मा जी ने जब यह बात पड़ोसियों को बताई भी तो कालोनी के सैंकड़ों लोग इकट्ठा होकर थाने पहुँच गए। थाने में अचानक इतनी भीड़ देखकर थाना इन्चार्ज भी बाहर आ गए, उन्होंने लोगों से उनके आने का कारण पूछा तो शर्मा जी ने एक्सीडेण्ट और इंस्पैक्टर द्वारा आदित्य के साथ किए गए दुव्र्यवहार के बारे में से बताया । “अच्छा, तो लाक-अप में बन्द मैनेजर साहब की सपोर्ट में आए हैं आप।” थानेदार ने त्यौरियाँ चढ़ाते हुए पूछा, “देखिए यह एक्सीडैण्ट का मामला है, और घायल युवक अभी बेहोश है, युवक के होश में आने पर ही तय हो पाएगा कि मैनेजर साहब दोषी हैं या नहीं और प्राइमाफेसी तो मैनेजर साहब की ही गलती लग रही है, फिर भी एक बार युवक को होश में आने दीजिए दूध का दूध, पानी का पानी हो ही जाएगा, आप लोग युवक के होश में आने की प्रार्थना कीजिए।” शर्मा जी ने थानेदार को समझाने की कोशिश की और बताया कि “ये दोनों ही तो थे जो इतनी भीड़ में से युवक की मदद को आगे आए थे , आपने तो इन्हें ही मुजरिम घोषित कर दिया,बजाय इसके कि आप इनको शाबाशी देते, आपने तो इन्हें हवालात की ही हवा खिला दी। आप ही बताइए! जब आप ही भले लोगों के साथ ऐसा सलूक करेंगे तो दुर्घटनाओं में घायल लोगों की मदद कोई क्यों करेगा? क्यों डालेगा कोई अपने आपको मुसीबत में ?” लेकिन थानेदार ने किसी की एक भी न सुनी।

थानेदार के इस व्यवहार पर भीड़ पुलिस विभाग के खिलाफ नारे लगाने लगी, पुलिस को यह बड़ा नागवार लगा तो कुछ सिपाहियों ने भीड़ के साथ धक्का-मुक्की करने की कोशिश की । फिर क्या था, भीड़ ने उग्र रूप धारण कर लिया, कुछ लोग थाने में तोड़-फोड़ करने लगे।

जनाक्रोश बढ़ता देख थानेदार ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर अतिरिक्त फोर्स भेजने का अनुरोध किया और देखते ही देखते फोर्स ने थाने को चारों ओर से घेर लिया। ठीक उसी समय एस.पी. सिटी भी थाने पहुँच गए । एस.पी.साहब ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ काम लिया, उन्होंने सबसे पहले भीड़ के बीच आकर वस्तुस्थिति की जानकारी ली तथा मामले की गम्भीरता को समझते हुए इंस्पैक्टर को उस युवक का हाल पूछने के लिए हस्पताल भेजा । हस्पताल से डाक्टर ने बताया कि आशु को होश आ गया है और अब वह खतरे से बाहर है तभी डाक्टर का माथा ठनका उसे याद आया कि उसके बेटे के प्राण बचाने वाले फरिश्ते को तो पुलिस ले गई थी। वह तभी दौड़ता हुआ थाने आया। उसने एस.पी. साहब को बताया कि आदित्य निर्दोष है और उसी के कारण उसके बेटे आशु की जान बच सकी है। अन्ततः एस.पी.साहब के निर्देश पर आदित्य को छोड़ दिया गया । डाक्टर, आदित्य और वीणा के सम्मुख सिर झुकाए खड़ा था, उसकी आँखों से निकल आए आँसू निश्चय ही उसके अपराध बोध के साक्षी थे। एस.पी. साहब ने इंस्पैक्टर को खूब लताड़ा तथा भविष्य में ऐसी गलती न करने की चेतावनी देते हुए पुलिस विभाग की ओर से क्षमायाचना की । उन्होंने एकत्र हुई भीड़ से कहा कि हम सभी लोगों को आदित्य जी से प्रेरणा लेकर एक अच्छे नागरिक होने का परिचय देना चाहिए। अस्पताल से वापस आते समय क्षीण आशा के साथ वीणा ने वीमेन्स् कालेज में फोन किया तो पता चला कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से साक्षात्कार स्थगित हो गया है। उसने आकाश की ओर देखा और दोनों हाथ जोड़ दिए।

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