बेट्टा ! यो रस्ता हर की पैड़ी जावै?

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सड़क पर परेशान सी दिख रही एक बूढ़ी महिला रास्ता पूछने के लिये आते-जाते लोगों को रोकने का प्रयास कर रही है पर हर कोई जल्दी में है,  आखिर, एक शरीफ सा दिखने वाला ग्रामीण युवक घंटा प्रसाद  एक गाना गुनगुनाता हुआ जा रहा है।  )

मां – अरे, रुक तो सई !  कतई लता मंगेसकर हुआ जारा !
घं. प्र. –  बोल, मेरी मां !  क्यूं परेसान हुई जारी !
मां – अरे, मैं यूं पुच्छूं !   यो रस्ता हर की पैड़ी जावै ?
घं.प्र. – मां, पागल हुई है?   यो सहारनपुर है !
मां – तो ?
घं.प्र. – यहां हर की पैड़ी ढूंढती फिरै ?
मां – तो?
घं.प्र. – हरद्वार चली जा !
मां – क्यूं चली जाऊं हरद्वार ?
घं.प्र. – वहां गंगा है !
मां – तो ?
घं.प्र. – हर की पैड़ी भी है !
मां – तो ?
घं.प्र. – ’तो तो’ क्या लगा रखी है ?
मां – हरद्वार जाऊं ?
घं.प्र. – हां, गंगा वहीं है।
मां – यो सहारनपुर है, यहां नाय है ?
घं.प्र. – ना !
मां – इब तुइ बता !
घं.प्र. – क्या बता ?
मां – पागल मैं या तू ?
घं.प्र. – तू !
मां – नई तू !
घं.प्र. – वो कैसे ?
मां – यो जो इतनी बड़ी नदी बैहवे है, यो क्या है?
घं.प्र. – यो, यो तो गंदा नाला है ?
मां – नाला है तेरा सिर !
घं.प्र. – वो कैसे ?
मां – तू अपना नाम बता !
घं.प्र. – मेरा नाम ?
मां – हां !
घं.प्र. – मेरा नाम जानके के करेगी ?
मां – रै मती,  नाम तो बता !
घं.प्र. – एल्लो,  डरै कौन ?
मां – तो फिर नाम बता !
घं.प्र. – मेरा नाम ?  घंटा परसाद !
मां – बड़ा सोना नाम है !
घं.प्र. – नाम छोड़,  तू काम बता !
मां – मान ले, तू नाली में गिरा पड़ा !
घं.प्र. – क्या उल्टी – पुल्टी बात्तां कर रई !
मां – नई, तू मान ले, तू नाली में गिरा पड़ा !
घं.प्र. – चलो मान लिया !
मां – रहवैगा तो फिर भी तू घंटा परसाद ही !
घं.प्र. – वो तो हुईं !
मां – कोई तुझे केहन लाग्गे कि अब तू नाली परसाद है, तो तू मान जागा ?
घं.प्र. – (बाहें चढ़ाते हुए) कैह के तो देखे कोई मुझे नाली परसाद !
मां – वोई तो !
घं.प्र. – वोई तो क्या ?
मां – यो जो नदी बैहवे है
घं.प्र. – कौन सी, यो नाला ?
मां – हां, योई नाला!   नाली परसाद !
घं.प्र. – तूने मुझे नाली परसाद बोला ?
मां – तूने इसे नाला बोला ?
घं.प्र. – तो क्या बोलूं ?
मां – पांवधोई गंगा, मेरे बेट्टे, पांवधोई गंगा !
घं.प्र. – पर इसमें तो गंदा पानी बैहवे है ?
मां – मैने करा इसे गंदा?
घं.प्र. – ना, मैन्ने करा !
मां – जब नाली में गिर के तू नाली परसाद नई हुआ तो ये गंदी होके नाला कैसे हो गई?
घं.प्र. – बात तो तू पते की कैहवे है !
मां – वोई तो !
घं.प्र. – वोई तो क्या ?
मां – यो कभी ना भूलियो कि ये गंगा है
घं.प्र. – ना भूलने का !
मां – तू नाली में गिरेगा तो वहीं पड़ा रैहवेगा या नहा धो के साफ सुथरा होवेगा ?
घं.प्र. – तू बार – बार मुझे नाली में क्यूं धकेले देरी ?
मां – ना धकेलने की ! पर पहले तू वादा कर !
घं.प्र. – बता मेरी मां, बता पर मुझे नाली में ना धकेले !
मां – तू पांवधोई गंगा को भी साफ करवावैगा !
घं.प्र. – मैं अकेल्ले ?
मां – पड़ा रहियो नाली में, इंतजार करियो – दस बीस लोग आवेंगे, तुझे निकाल्लेंगे तब तू निकलेगा।
घं.प्र. – समझ गया मेरी मां समझ गया !
मां – क्या समझ गया ?
घं.प्र. – योई कि मैं कोशिश तो शुरु करूं । और लोग भी आवेंगे पिच्छे पिच्छे ।
मां – वाह बेट्टा ! तू तो बड़ाई समझदार निकला !
घं.प्र. – ना मां, समझदार तो तू है ! तुन्ने ई तो सिखाया !
मां – मैं गुरु ! तू मेरा चेल्ला ?
घं.प्र. – हां, मां, हां ! तू गुरु, मैं तेरा चेल्ला !
मां – तो चल, फिर पैर छू ! आज होली है, आसीस दूंगी जी भर के अपने बच्चे को !
घं.प्र. – (पैर छूता है)
मां – जुग – जुग जियो मेरे लाल ! ला, तेरे थोड़ा सा गुलाल मल दूं !
(होली मिलन) !

– सुशान्त सिंहल

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