सहारनपुर में धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं – डा. छवि जैन

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डा. छवि जैन मुन्नालाल जयनारायण खेमका गर्ल्स डिग्री कॉलिज, सहारनपुर के कला संकाय में प्रवक्ता के रूप में  कार्यरत हैं।  सहारनपुर जनपद के जैन मंदिरों में भित्ति अलंकरण विषय पर आपका शोध प्रबन्ध बहुत चर्चित रहा है और इस पर आपको Ph.D. के अतिरिक्त भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् (Indian Council for Historical Research, New Delhi) से जूनियर रिसर्च फैलोशिप भी प्राप्त हुई है। आप न केवल एक सिद्धहस्त कलाकार हैं अपितु लेखिका के रूप में भी आपने अपना एक विशिष्ट स्थान अर्जित किया है। आपकी लगभग 20 कलाकृतियां पारंपरिक व लोकविषयक विषयों पर प्रदर्शित, प्रशंसित और पुरस्कृत हुई हैं व अनेक शोध पत्र विभिन्न पत्रिकाओं व ग्रंथों में प्रकाशित हुए हैं। डा. छवि सहारनपुर की नयी पीढ़ी का न केवल प्रतिनिधित्व करती हैं बल्कि अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से सहारनपुर को एक श्रेष्ठ छवि भी प्रदान करती हैं। डा. छवि जैन से द सहारनपुर डॉट कॉम के मुख्य संपादक की बातचीत के कुछ अंश पाठकों के लिये प्रस्तुत हैं ।

सं. – डा. छवि जैन, द सहारनपुर डॉट कॉम पोर्टल पर आपका हार्दिक स्वागत है।

छवि – मैं आपकी हृदय से आभारी हॅूं कि आपने ‘द सहारनपुर डॉट कॉम वेब पोर्टल’ जैसे लोकप्रिय मंच पर मुझे आमंत्रित किया। द सहारनपुर डॉट कॉम के विश्व भर में फैले पाठकों को मैं ’हैलो’ कहना चाहती हूं!

सं. छवि, कला में आपकी इतनी अधिक रूचि है, इस का श्रेय आप किसको देती हैं? अपने लालन-पालन को? या आपको यह शौक अपने परिवार से आनुवांशिक रूप से मिला है? आपके परिवार में कलात्मक अभिरूचि और किन – किन की रही है?

छवि- पेंटिंग में इतनी रूचि मुझे अपने परिवार से ही मिली है और मैं आज जो कुछ भी कर पायी हूं या कर रही हूं उसका श्रेय सबसे पहले मैं अपनी मां को ही देना चाहूंगी। मेरी मां बहुत सुन्दर पेंटिंग करती थी और जाने-अनजाने उन्हीं से मुझमें भी कलात्मक रूचि आयी।

सं. आपकी कलात्मक प्रतिभा को सवांरने, निखारने में किन लोगों का सबसे अधिक योगदान रहा है?

छवि – जैसा कि मैने अभी कहा, पेंटिंग में मेरी रूचि तो मुझे अपनी मां से ही मिली है। हां, इस रुचि को निखारने में निश्चय रूप से मेरे अध्यापकों का महत्वपूर्ण योगदान है।

सं. – आप अपना रोल मॉडल किनको मानती हैं?

छवि – मेरी आदर्श मेरी गुरु श्रद्धेय डॉ. मधु जैन हैं, जिनको मैं अपना रोल मॉडल मानती हूं।

सं. आपने अपनी पीएच. डी. के लिये जो विषय चुना, उसकी कोई विशेष वज़ह थी?

छवि – मैं बचपन से ही अपने शहर के मंदिरों, विशेषकर जैन मंदिरों को कला के विद्यार्थी की नज़र से देखती आई हूं और इन मंदिरों में मौजूद कला मुझे अपनी ओर आकर्षित करती रही है। जब पीएच.डी. का विषय चुनने की बात मन में आई तो सहसा खयाल आया कि क्यों नहीं अपने शहर के इन मंदिरों पर ही शोध किया जाये। जब इस बारे में अपनी गुरु और गाइड से विचार विमर्श किया तो उन्होंने भी बहुत उत्साहित किया।

सं. – हमारे सहारनपुर शहर में इतना कुछ देखने – समझने के लिये है किन्तु इस जनपद को कभी पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। क्या लगता है आपको, क्या सहारनपुर में पर्यटन की दृष्टि से पर्याप्त संभावनायें हैं और इस जनपद को पर्यटन मानचित्र पर लाने हेतु प्रयास किये जाने चाहियें?

छवि – जी बिल्कुल! सहारनपुर नगर के आस-पास के ग्रामीण क्षेत्र में सामान्य लोग भी कई प्रकार के परम्परागत एवं कलात्मक कार्यों में संलग्न रहते हैं जिस कारण यहॉं अनेक प्रकार के शिल्पों का विकास हुआ। ये कलाकार हम सब के लिये अपरिचित ही हैं, अपने कार्यक्षेत्र से बाहर इनकी कोई विशेष पहचान भी शायद ही हो किन्तु इससे इनकी कला और प्रतिभा का महत्व कम नहीं हो जाता। इनकी कला को प्रोत्साहन देने के लिये, दूर – दूर तक पहुंचाने के लिये पर्यटन का बहुत बड़ा सहयोग हो सकता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस दृष्टि से भी इस क्षेत्र में पर्यटन की सम्भावना खोजी जानी चाहिये। सहारनपुर के काष्ठ कला उद्योग के बारे में तो देश – विदेश में बहुत लोग जानते भी हैं ! सहारनपुर की काष्ठ कला पर्यटन को बढ़ावा देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सं. क्या सहारनपुर में ऐसे कुछ प्राचीन मंदिर उपलब्ध हैं जो धार्मिक पर्यटन में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित कर सकते हैं?

छवि – सहारनपुर बहुधर्मावलम्बी नगर है। इस नगर में तथा उसके आस-पास अनेक जैन, वैष्णव, शैव तथा शाक्त सम्प्रदायों के मंदिर तथा फकीरों की मजारें मौजूद हैं जिनकी धार्मिक मान्यता तो है ही, साथ ही, वास्तुशिल्प और भित्ति-अलंकरण के लिये भी ये मंदिर महत्वपूर्ण हैं। यदि उन सभी पहलुओं को सही रूप में उजागर किया जाये तो धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी इस क्षेत्र में पर्यटन की सम्भावनायें बढ़ सकती हैं।

सं. सहारनपुर को पर्यटन नगरी बनाने के मार्ग में क्या-क्या बाधायें आपको अनुभव होती हैं?

छवि- सहारनपुर में पर्यटन के संदर्भ में सबसे बड़ी बाधा यहां सफाई की कमी है। नगर के बीच में खुले गन्दे नाले न केवल दुर्गंध का कारण हैं परन्तु उस कारण अनेक प्रकार की बीमारियॉं भी फैल सकती हैं। अतः यह अति आवश्यक है कि नगर को स्वच्छ बनाया जाये और गन्दे नालों को साफ करके उसमें बहते पानी की व्यवस्था हो यदि ऐसा किया जाये तो वह पर्यटन के लिये आकर्षण बन सकता है। सहारनपुर पौधों की नर्सरी के लिये आस-पास के क्षेत्रों में प्रसिद्ध है – क्या ही अच्छा हो कि उन गन्दे नालों के आस-पास व्यावसायिक तौर पर फूलदार पौधे लगाये जायें। शहर में सड़कें, गली और कूचे न केवल अव्यवस्थित हैं परन्तु तंग और टूटे-फूटे भी हैं। अतः उनको साफ-सुथरा और पक्का बनाया जाना अत्यन्त आवश्यक है। नगरवासियों को इन कमियों के बारे में सचेत किया जाना चाहिये।

सं. – सहारनपुर के जैन मंदिरों में प्राचीनतम मंदिर कौन-कौन से हैं? ये किस काल खंड के प्रतीत होते हैं? यदि इन मंदिरों की स्थापत्य कला या अलंकरण की तुलना देश में मौजूद अन्य मंदिरों से करनी हो तो किन मंदिरों से की जा सकती है?

छवि- ये सभी मंदिर सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के ही हैं, जैसा कि उसके वास्तुशिल्प और भित्ति-अलंकरण से ज्ञात होता है।

सं. मूर्ति शिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से नये और प्राचीन जैन मंदिरों में क्या कुछ विशेष अंतर दिखाई देते हैं?

छवि- क्योंकि ये सभी मंदिर सोलहवीं शताब्दी के बाद के ही हैं अतः उनके वास्तुशिल्प पर मुगल वास्तुशिल्प का प्रभाव स्पष्ट है और भित्ति-चित्रों के अलंकरण में भी वह प्रभाव उभरकर सामने आया है। बाद के बने भित्ति-चित्रों में अंग्रेजी प्रभाव भी देखने को मिलता है।

सं. क्या जैन मंदिरों में किसी भी धर्म के अनुयाइयों को प्रवेश की अनुमति उपलब्ध रहती है?

छवि – जैन धर्म में किसी प्रकार का और किसी आधार पर भी भेद-भाव मान्य नहीं है। अतः उनमें सभी का स्वागत किया जाता है।

सं. – आप आजकल भी किसी विषय पर शोधपत्र की तैयारी में हैं क्या?

छवि – चित्रकला और लेखन में न सिर्फ मेरी गहन रूचि है, बल्कि अब तो यह मेरा व्यवसाय भी है। अतः जब कोई निश्चित कार्य हाथ में न हो तब भी मैं इच्छानुसार विभिन्न विषयों पर लेखन कार्य करती रहती हूं और चित्र भी बनाती रहती हॅूं।

सं. – कला संकाय में प्रवक्ता के रूप में क्या आपने कुछ नये प्रयोग करने की कोशिश की है ताकि आपके विद्यार्थियों में कला क्षेत्र में कुछ अभिनव करने की इच्छा जाग्रत हो?

छवि – पारम्परिक चित्रकला में प्रतिदिन नये आयाम स्थापित होते रहते हैं क्योंकि आज की रचना-धर्मिता में एक्सपेरिमेंटेशन और मौलिकता को अधिक महत्व दिया जाता है। यह प्रक्रिया देश और काल के प्रभाव में सतत् और क्रमिक है। इसी संदर्भ में मेरा प्रयास लोक चित्रकला के अनेक बिम्बों को पाठ्यक्रम में सिखाई जाने वाली कलाओं में सम्मिलित करने का रहता है।

सं. आज आपसे बात कर कला के विषय में काफी कुछ जानने – समझने को मिला। हमें उम्मीद है कि हमारे पाठकों को भी आपसे यह भेंट बहुत रुचिकर रही होगी। आपसे भविष्य में भी भेंट होती रहेगी, यह हमें आशा है।

छवि – जी अवश्य ! मुझे भी इस भेंट के दौरान अपनी रुचि के बारे में, अपने शहर के बारे में बात करके बहुत अच्छा लगा और यदि अवसर देंगे तो भविष्य में भी यह सिलसिला बनाये रख कर मुझे प्रसन्नता होगी । एक बार पुनः आपको धन्यवाद और सभी पाठकों को नमस्कार!

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