बस वाली लड़की

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एक हाथ में बैग दूसरे हाथ से सैलफोन कान से सटाए, बातें करती हुई वह बठिण्डा के फौजी चौक से बस में चढ़ी थी। गोरा रंग,  सुडौल काया, लम्बा कद, मोर पंखी रंग की कमीज जो कि घुटनों से करीब चार-पाँच इंच ऊपर ही सिमट कर रह गई थी और गहरे गुलाबी रंग की स्लैक्स जो उसकी पिण्डली, घुटने और जंघाओं के कोमल उतार-चढ़ावों से गुजरती हुई उसके कूल्हों में कस कर बंधी हुई थी। कमीज़ के चाक लड़की की लचकती पतली कमर तक खुले थे, दोनों पल्लों के खुले चाक और स्लैक्स के संयोग से बनी त्रिभुजाकार खिड़की में से उसके गोरे बदन का जब-तब बाहर झाँकना, देह का नेह निमंत्रण सा प्रतीत हो रहा था। गोरे चेहरे पर बहुत ही बारीकी से तराशी गयी काम-कमान भवें, जिनके नीचे झील सी गहरी दो आँखें और काजल से सजे किनारों के भीतर दूर तलक फैला नीला विस्तार, और इन दिव्य झीलों की निगरानी के लिए तैनात, दांयी ऑंख के ऊपर से झूलती नागिन सी एक लट। बांयें गाल पर ऑंख की बाहरी कोर के ठीक नीचे बना एक काला तिल और दोनों भवों के बीचों-बीच नाप तौल कर स्थापित की गयी एक छोटी सी गुलाबी बिन्दिया रूप सौन्दर्य के नये प्रतिमान गढ़ रहे थे। उसके खुले हुए काले, घने, रेशमी केश उसकी पीठ और कन्धों पर शोभायमान थे तो कुछ केश कन्धों पर से सरक कर उसके उन्नत वक्षों को कुछ इस प्रकार ढॉंप रहे थे जैसे पूनम के चॉंद पर कोई आवारा सी बदली ऐसे छा जाए कि न तो चॉंद छिपे ही और न दिखे ही। ऊँची एड़ी की सैंडिल और महीन डिजाइन वाली चाँदी की सुन्दर सी पायल उसके पैरों की खूबसूरती तो बढ़ा ही रही थी साथ ही उनकी रुन-झुन, टक-टक, टक-टक, रुन-झुन की संगीतमयी कर्णप्रिय आमद सभी को आकर्षित कर रही थी। लड़की स्वर्ग से उतर आयी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

विक्रम ने जब तक उसकी सुन्दरता का अध्ययन किया तब तक वह टू बाई टू की सीटों वाली इस मर्सिडीज़ बस की तीसरी लाइन पार कर आई थी। इस बीच बांए हाथ में थामा हुआ उसका बैग एक अधेड़ के कन्धे पर जोर से बजा जिसे शायद उसने अपना सौभाग्य माना और लड़की के सॉरी कहने पर एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए “माय प्लेज़र” कहकर लड़की का आभार व्यक्त किया। ये अलग बात है कि बाद में वह अधेड़ अपने उसी कन्धे को देर तक मलता रहा। विक्रम पाँचवी पंक्ति की इक्कीस नम्बर की खिड़की वाली सीट पर था और दूसरी ओर खिड़की वाली ही अट्ठारह नम्बर की सीट पर भी एक और नवयुवक बैठा था। उन दोनों ही के साथ वाली उन्नीस और बीस नम्बर कर सीटें खाली थीं और दोनों ही के मन में उत्सुकता और कौतुहल ने हलचल मचा रखी थी कि लड़की किसके साथ वाली सीट पर बैठती है। उन में ही क्यों? यह हलचल तो शायद बस में सफर कर रही प्रत्येक सवारी के मन में भी थी और सभी उत्सुक थे कि कौन बनेगा सौभाग्यशाली ? इस बीच लड़की ने फोन कान से हटा लिया था। लड़की ने पॉंचवीं पंक्ति के पास आकर पहले अट्ठारह नम्बर सीट पर बैठे युवक की तरफ देखा फिर विक्रम की।

इससे पहले कि लड़की कुछ बोलती विक्रम के मुँह से अक्समात ही निकल गया “खाली है“। लड़की मुस्कुराई और उसके बराबर वाली बीस नम्बर सीट पर बैठ गई। विक्रम को लगा कि जैसे उसने तीसरा विश्व यु़द्ध जीत लिया हो। उधर अट्ठारह नम्बर पर बैठे युवक का तो बस चेहरा ही देखने लायक था। लड़की का सैल फोन फिर बजा, “सोनिया मेरी बात ध्यान से सुन! माँ की तबीयत फिर से खराब हो गयी है इसलिए मुझे आज फिर चण्डीगढ़ जाना पड़ रहा है समझ गयी ना, प्लीज़ टैल दि वार्डन एकोर्डिंगली!   और यार सुन, अगर बाइ चांस माँ का फोन आ जाए तो तू सम्भाल लेना, यू फॉलो मी ना ? आइ नो यू वैल ईडियट, लास्ट टाइम तूने दही में कैसे नीम्बू निचौड़ा था आइ कान्ट फॉरगेट, बड़ी मुश्किल से सिचुएशन सम्भाली थी मैंने।“

मोबाइल पर हो रही लड़की की बातें विक्रम को ठीक से सुनायी पड़ रही थी पर दूसरी ओर से किसी ने क्या कहा ठीक से सुनायी नहीं दे रहा था लेकिन फिर भी वह लड़की की बातों से समझ रहा था कि चर्चा का विषय क्या है? और समझता भी क्यों नहीं ? बगल में परी स्वरूपा लड़की और वो भी अकेली, उसकी बातें तो भाई अंधे को भी दिखाई दे और बहरे को सुनाई पड़ने लगती। विक्रम बड़े ध्यान से लड़की की बातें सुनता रहा। लड़की को शायद भनक लग गयी थी कि विक्रम उसकी बातें गौर से सुन रहा है इसलिए उसके बाद लड़की इधर-उधर की कुछ बातें करती रही जो विक्रम के पल्ले नहीं पड़ी और कुछ देर बाद “बॉय स्वीटहार्ट“ कहकर लड़की ने फोन काट दिया। लड़की ने बैग में से गोगल्स् निकाल कर नाक पर टिकाए और सीरियस मुद्रा में बैठ गयी।

लड़की की माँ बीमार है! इस बात से विक्रम के मन में लड़की के प्रति सहानुभूति का समन्दर हिलोरें मारने लगा था। मॉं के प्रति लड़की का लगाव भी विक्रम को अभिभूत कर रहा था। वह मन ही मन सोचने लगा कि पता नहीं लोग बेटियों के प्रति इतने असंवेदनशील क्यों हैं? क्यों मार देते हैं उन्हें पैदा होने से पहले ही? क्यों नहीं बनने देते उन्हें इस दुनिया का हिस्सा?वे भी करें स्थापित नये कीर्तिमान, कर दें साबित कि बेटियॉं, बेटों से किसी भी प्रकार कमतर नहीं होती बल्कि वे बेटों से ज्यादा संवेदनशील, जिम्मेदार और ज्यादा विश्वासयोग्य होती हैं।

विक्रम की नज़र न चाहते हुए भी, लड़की की तरफ चली ही जाती और यह एहसास होने पर कि लड़की उसकी तरफ देख रही है, वह खुद को मोबाईल में व्यस्त होने का प्रदर्शन करता। बस बठिण्डा से चण्ड़ीगढ़ की तरफ पूरी रफ़तार से बढ़ रही थी किन्तु विक्रम को लग रहा था कि बस धीरे से चल रही है। वह चाहता था कि लड़की अपनी बूढ़ी बीमार माँ के पास जल्दी से भी जल्दी पहुँच जाए।

“टिकट प्लीज़!“कण्डक्टर ने विक्रम को उसकी ख्यालगोई से बाहर ला पटका। लड़की चुस्त थी उसने तुरन्त ही पर्स में से 500 रुपए का एक नोट कण्डक्टर की तरफ बढ़ाते हुए कहा “चण्डीगढ़़“।

कण्डक्टर यह जानता था कि लड़की बस में अकेली ही चढ़ी है फिर भी उसने शरारती अंदाज़ में पूछा “दो“?

लड़की ने कनखियों से विक्रम की तरफ देखा और कहा “नहीं, एक“।

विक्रम मन ही मन कुढ़ गया। वह बुदबुदाया “अरे जानेमन झूठे से ही कह देती ‘‘2’’ तो कुछ फर्क पड़ जाता क्या? मैं कौन सा चण्डीगढ़ जा रहा हूॅं।“

लड़की से बात कर लेने भर से कण्डक्टर के चेहरे पर अचानक छा गयी खुशी बड़ी ही स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। लड़की को पैसे लौटाने के उपक्रम में उसने लड़की के कोमल हाथ को स्पर्श करने का असफल प्रयास किया और “मैन्नू लग्या तुस्सी दोआँ नाल ही हो जी“ बोल कर बत्तीसी दिखाते हुए विक्रम की ओर देखने लगा। विक्रम कण्डक्टर की सारी हरकतें देख चुका था, उसके इस कृत्य से विक्रम का तो खून ही खौल रहा था, उसका वश चलता तो वह कण्डक्टर की अच्छी धुलाई करता। अपने गुस्से पर काबू करते हुए उसने पैसे कण्डक्टर की ओर बढ़ा दिए। कण्डक्टर ने पूछा “चण्ड़ीगढ़?“ विक्रम गुस्से में तो था ही बिना सोचे ही हाँ में सिर हिला दिया। टिकट देने के बाद कण्डक्टर ने फिर से दोनों की तरफ बारी-बारी से देखा और खीसें निपोरता हुआ आगे बढ़ गया। कण्डक्टर के चले जाने के बाद ही विक्रम को ध्यान आया कि उसे तो पटियाला ही जाना था और ये टिकट चण्ड़ीगढ़ की! उसने टिकट चेंज करने के लिए कण्डक्टर को आवाज देनी चाही लेकिन यह सोच कर रुक गया कि लड़की को जब यह बात पता चलेगी कि मैंने पटियाला के बजाय चण्डीगढ़ की टिकट ले ली तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगी? मेरा तो इम्प्रशन ही जाता रहेगा। वह अच्छी तरह जानता था कि फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ दि लास्ट इम्प्रैशन, फिर आस-पास बैठी सवारियॉं भी उसके बारे में क्या सोचेंगी उसे इसका भी पूरा डर था और ऊपर से वो ठरकी कण्डक्टर! न जाने क्या-क्या, अनाप-सनाप सोचेगा मेरे बारे में ?, सारे कैल्कुलेशनस् के बाद आखिर उसने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।

बस, अब तक बरनाला की हण्डयाया कैंची मतलब चौराहे पर पहुँच गयी थी वहाँ कुछ सवारियॉं बस से उतरी तो कुछ बस में चढ़ी भी। बस में चढ़ने वाली सवारियों में एक नवयुवक भी था जो ठीक हमारे बराबर में दूसरी साइड की उन्नीस नम्बर सीट पर बैठ गया था। अपने रुटिन के अनुसार कण्डक्टर उस युवक के पास आया और टिकट खरीदने के लिए बोला। युवक ने स्टूडेंट पास निकालकर कण्डक्टर के हाथ में थमा दिया। पास देखते ही कण्डक्टर ने युवक से कहा कि आज तो छुट्टी है, ये तो नहीं चलेगा। विक्रम को पहली बार मालूम हुआ था कि छुट्टी के दिन स्टूडेंट पास इनवैलिड होते हैं। पास को लेकर उन दोनों में बहस होने लगी थी और बात इतनी बढ़ गयी थी कि कण्डक्टर ने बस को साइड में रुकवा दिया और लड़के को नीचे उतारने की जिद पर उतारु हो गया। काफी गहमा-गहमी, कहा-सुनी और यात्रियों के हस्तक्षेप के बाद युवक ने कण्डक्टर को किराए के पैसे दे दिए। कण्डक्टर और युवक की नोंक झोंक के बीच लड़की ने बस एक बार विक्रम की ओर देख कर पूछा था “आज छुट्टी है क्या?“

विक्रम अभी नवयुवक यात्री के साथ हुई बहस और पटियाला के बजाय चण्ड़ीगढ़ का टिकट खरीदने के तिलिस्म के बारे में सोच ही रहा था कि लड़की का सैलफोन फिर से घनघनाया। सैलफोन की रिंगटोन पर बहुत ही प्यारा सा गीत बज रहा था “साँझ न ढल जाए जीवन की, अब तो आजा ओ सजना“ विक्रम उस मधुर गीत का आनन्द ले ही रहा था कि चालक ने सामने से आ रही एक कार को बचाने के लिए बस को इतनी तेजी से काटा कि लड़की विक्रम की गोद में लुढ़क गयी और उसका अपना सिर भी बस की खिड़की में धाड़ से बजा। उस कोमलांगी का इस तरह उसकी गोद में गिरना और उस क्षणिक स्पर्श से व्युत्पन्न आनन्द की अनुपम अनुभूति जो विक्रम को हुई उसे कलमबद्ध कर कागज पर उकेरना मेरे वश की बात नहीं है।  लड़की अब तक सम्भल चुकी थी और अचानक घटित इस स्थिति से अपना ध्यान बंटाने के लिए वह सेलफोन पर किसी से बात करने लगी। फोन पर बात करते-करते कनखियों से विक्रम कोउसका यदा-कदा देख लेना विक्रम को आल्हादित कर देता।

फोन पर हो रही बातों से विक्रम को लगा कि लड़की किसी लड़के से ही बात कर रही थी और बात-बात में जानू, हनी, स्वीटहार्ट, मॉय पुच्चू और न जाने कैसे-कैसे सम्बोधनों से उसे रिझा रही थी। किसी दूसरे लड़के के साथ लड़की का इस तरह प्यार भरी बातें करना, सोचकर ही विक्रम के दिल पर साँप सा लोट रहा था। उसका मन किया कि वह लड़की से सैलफोन छीनकर बस के पहिए के नीचे रख कर सैलफोन का अस्तित्व ही मिटा दे। वह उस लड़के के सौभाग्य और अपने दुर्भाग्य पर चिन्तित था कि उसके कान खड़े हो गए। लड़की कह रही थी कि वह पटियाला बस स्टैण्ड के बाहर लगी डॉ अम्बेडकर की मूर्ति के पास उसे मिलेगी। विक्रम को काटो तो खून नहीं। विक्रम को लड़की की वे सारी बातें एक-एक कर याद आने लगी जो उसने बठिण्डा से चलते हुए अपनी सहेली सोनिया से कही थी। उसने तो बहुत ही भरे मन से कहा था कि उसकी माँ बहुत बीमार है और वह अपनी बूढ़ी बीमार माँ को देखने के लिए चण्ड़ीगढ़ जा रही है। पटियाला और चण्डीगढ़ के बीच घटित होने वाले इस घटनाक्रम के विषय में विक्रम को कुछ भी तो समझ नहीं आ रहा था। इस अनपेक्षित घटना ने विक्रम के मन मस्तिष्क में हलचल मचा दी।  वह कभी सोचता कि शायद उसके सुनने में ही कुछ गलती लग गयी होगी तो कभी सोचता कि यदि लड़की को पटियाला ही जाना था तो उसने चण्डीगढ़ का टिकट क्यों लिया? बड़ी मुश्किल से उसने स्वयं को यह दिलासा देकर शान्त किया कि बस पटियाला में कम से कम दस-पन्द्रह मिनट तो रुकेगी ही और लड़की उतनी देर में उस लड़के को मिलकर वापस आ ही सकती है। उसने इस सत्य को भी स्वीकारा कि यह तो उस लड़की का व्यक्तिगत मामला है, वह अपनी माँ से मिलने जाए या किसी और से उसे इस बात से क्या ?, आखिर वह लड़की का लगता भी क्या है?

बस अब हाइवे पर स्थित दीपक ढ़ाबे पर रुक गयी थी। अधिकतर सवारियां नीचे उतर कर खाने-पीने में व्यस्त हो गयी। वह लड़की बस से नीचे नहीं उतरी और न ही विक्रम। बस में छायी चुप्पी को लड़की ने ही तोड़ा और उससे बोली “आप चण्डीगढ़ जा रहे हैं?“

“नहीं पटियाला“ विक्रम ने बेरुखी से संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“लेकिन आप ने टिकट तो चण्डीगढ़ का लिया है?“ लड़की ने प्रश्नात्मक शैली में पूछा। विक्रम का मन हुआ कि उसे दो टूक जवाब दे दे कि टिकट तो तुमने भी चण्डीगढ़ का ही लिया है, लेकिन तुम कहाँ जाओगी? पता है मुझे, लेकिन यह सब कहने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाया और उसने लड़की से कहा कि जाना तो मुझे चण्डीगढ़ ही था पर अब पटियाला में ही उतरुँगा। विक्रम का उत्तर सुनकर एक बार तो लड़की झेंप सी गयी लेकिन तुरन्त ही उसने अपने हाव-भाव सामान्य कर लिए। विक्रम ने अपने मन में उठ रहे कितने ही अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर पाने की गरज से लड़की से पूछ ही लिया कि “आप कहॉं जाएंगी?“

“मैं अपनी मॉं को देखने चण्डीगढ़ जा रही हॅूं, पिछले कई दिनों से बहुत बीमार है“ लड़की ने बडे़ ही सहज भाव से बताया।

विक्रम को उससे इस उत्तर की कतई भी उम्मीद नहीं थी। लड़की का उत्तर सुनकर उसे अपनी तुच्छ सोच पर बहुत गुस्सा आया। लड़की के बारे इतनी घिनौनी बात उसने सोच भी कैसे ली यही सोच कर वह शर्म से पानी-पानी था। एक बार फिर से लड़की का चरित्र और व्यक्तित्व विक्रम की नजर में बहुत ऊँचा हो गया था। सवारियॉं वापस बस में बैठ गयी तो बस दीपक ढाबे से चल पड़ी। लड़की ने सामान्य बातचीत के दौरान बस इतना ही बताया था कि लड़की बठिण्डा के किसी गवर्नमैंट इंजीनियरिंग कालेज में बीटैक सैकेण्ड ईयर की स्टूडैंट थी।

बस, अब संगरूर पहुॅंचने वाली थी। इस बीच कण्डक्टर ने कई चक्कर बस में इधर से उधर लगाए और उनके पास से आते-जाते हुए वह लड़की की तरफ बेहूदी मुस्कान फेंकना नहीं भूला। दीपक ढाबे से संगरूर तक दोनों में लगभग चुप्पी ही बनी रही।

संगरूर से बाहर निकलते ही लड़की का सैलफोन फिर से घनघनाया। विक्रम के कान फिर से उसकी बातों पर ही थे। इस बार फोन पर शायद कोई महिला थी। बातचीत से लग रहा था कि महिला कोई और नहीं बल्कि लड़की की माँ ही थी। लड़की कह रही थी कि “माँ, आज मैं घर नहीं आ सकती, कल रविवार को भी कालेज खुलेंगे, मुझे एक बहुत ही जरूरी एसाइनमैंट तैयार करना है।“ यह सब सुनकर विक्रम के तो रांगटे खड़े हो गए उसका हाल ऐसा हो गया जैसे काटो तो खून नहीं। उधर लड़की की मॉं थी कि रट ही लगाए हुए थी कि तुम जैसे-तैसे भी घर आ जाओ। दोनों की बातचीत से ऐसा लग रहा था कि लड़की की मॉं वास्तव में ही बीमार थी। लड़की अपनी माँ को बार-बार समझाने की कोशिश कर रही थी कि “देखो माँ यदि यह एसाइनमैंट समय पर सब्मिट नहीं हुआ तो मेरे इन्टरनल मार्क्स् कम हो जाएंगे जिससे मेरी पर्सेंटेज़ डाऊन हो जायेंगी और मॉं मैं यह भी जानती हूँ कि आप कभी भी नहीं चाहोगी कि मैं एग्जाम्स् में फेल हो जाऊँ ?“ उसने लगे हाथ अपनी मॉं को सलाह भी दे डाली कि वह मामा जी को घर बुला ले, जो कुछ पैसे भी ले आयेंगे और किसी अच्छे डाक्टर को दिखा भी देंगे। फिर उनमें क्या बात हुई? विक्रम की समझ में नहीं आया, क्योंकि लड़की का पारा बढ़ता जा रहा था और कुछ देर बाद उसने फोन ही काट दिया था।

विक्रम की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कौन सी बात को सही माने लड़की ने जो बातें अपनी सहेली से कही थी और फिर विक्रम को भी बतायी थी उन्हें या अब जो वार्तालाप उसकी माँ के साथ हुआ उसे। दोनों में कितना विरोधाभास? विक्रम हतप्रभ था। बस अब तक पटियाला शहर में घुस चुकी थी। विक्रम को प्रतीक्षा थी तो बस पटियाला बस स्टैण्ड पहुँचने की। उसने अपना बैग सम्भाल लिया था और तय कर लिया था कि जैसे ही लड़की बस से उतरेगी वह भी उसके पीछे-पीछे उतर जाएगा और देखेगा कि लड़की जाएगी कहाँ ?

बस पटियाला रेलवे स्टेशन के पास बने फ्लाईओवर को पार कर ही रही थी कि लड़की अपनी सीट से उठी, बैग कन्धे पर लटका कर सीट के सहारे खड़ी हो गयी। लड़की के सीट से उठने के उपक्रम से ही विक्रम को लगा कि अब उसे लड़की का पीछा करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन वह लड़की के मूवमैंट को ध्यान से देखता रहा। बस जैसे ही डॉ अम्बेडकर की प्रतिमा के पास रुकी, लड़की अपनी योजनानुसार बस से उतर गयी। विक्रम की ऑंखें अब प्रतिमा के आस-पास खड़े युवकों पर थीं। देखते ही देखते लड़की प्रतिमा के पास खड़ी सफेद रंग की एक कार के पास पहुँची सामने की खिड़की का दरवाजा खोल कार में बैठी और पलक झपकते ही विक्रम के मानस पटल पर ढ़ेर सारे अनुत्तरित प्रश्न छोड़, आँखों से ओझल हो गयी बस वाली लड़की।

– कश्मीर सिंह

संप्रति – मुख्य प्रबन्धक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, लुधियाना

 

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