प्रभाकर जी – एक अद्‍भुत प्रेरक व्यक्तित्व

पद्मश्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का एक विहंगम परिचय

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prabhakarji2सहारनपुर, जनपद के देवबंद, कस्बे में 29 मई 1906 को जन्मे पद्मश्री डॉ पंडित कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं l आपके व्यक्तित्व और कृतित्व ने सहारनपुर जनपद को एक पहचान दी l पंडित कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ स्वतंत्रता सेनानी थे, पत्रकार थे, लेखक थे, कथाकार थे, निबंधकार थे और इन सबसे ऊपर आप थे शैलियों के शैलीकार।

प्रभाकर जी जिन आदर्शों का शंख फूकना चाहते थे उनको उन्होंने स्वयं अपने जीवन में अपनाया था l मात्र पांच वर्ष की आयु में ही अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का विरोध करना आरम्भ कर दिया था और एक मौलवी द्वारा दिए गए ताबीज़ को हाथ में बंधवाने से मना कर दिया था l युवावस्था में ही आपने पढ़ाई छोड़, आज़ादी की लड़ाई और सुधार आंदोलनों में खुद को समर्पित कर दिया था l मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में ही आप देश की आज़ादी के लिए जेल गए, विदेशी शासन के हाथों यातनाएं सहीं और स्वतंत्रता प्राप्ति तक आपका यह जुनून जारी रहा l अंग्रेजी हुक्मरान द्वारा निरंतर उनकी निर्मम और योजनापूर्ण ढंग से पिटाई की गई ताकि वे पत्रकारिता के योग्य न रहें, किन्तु देखिये, अंग्रेज़ी शासन का सूर्य भारत में अस्त हुआ 15 अगस्त 1947 को और ठीक उसी दिन प्रभाकर जी द्वारा संपादित पत्र “विकास” का पुनर्जागरण हुआ, अत्याचारी हारा क्रांतिकारी जीता। आपकी पुस्तक “तपती पगडंडियों पर पदयात्रा” इन सबका लेखा-जोखा है l

प्रभाकर जी का लेखन लोकरंजन का माध्यम नहीं थाl वे लिखते थे तो बस नागरिकता के गुणों का विकास करने के लिए l उनके ही शब्दों में – “हमारा काम यह नहीं कि हम इस विशाल देश में बसे चंद दिमागी अय्याशों का फ़ालतू समय चैन और खुमारी में बिताने के लिए मनोरंजक साहित्य का मयखाना हर समय खुला रखें l हमारा काम तो यह है कि हम इस विशाल और महान देश के कोने –कोने में फैले जन सामान्य के मन में विश्रंखलित मौजूदा हालात के प्रति विद्रोह और भव्य भविष्य के निर्माण की श्रमशील भूख जगाएं l”

प्रभाकर जी की कलम शब्दों को जो आकार देती थी, उससे शब्दों का कायाकल्प ही हो जाता थाl उनके शब्दों में छुअन है,गुदगुदाहट है, डांट भी है तो पुचकार भी, कभी कान उमेठते हैं तो कभी लगता है आशीषों  की झड़ी लगी हुई है l कभी लगता है कि दादा जी नसीहत दे रहे हैं तो कभी पिता की चिंता उनके विचारों में दृष्टिगत होती है l

‘प्रभाकर’ जी ने एक पुस्तक लिखी “महके आँगन – चहके द्वार” l भारत भर की भाषाओं में अपने ढंग की यह अकेली पुस्तक है, जो स्त्री-पुरुष में मीठी गाँठ जोड़ती है और टूटी गाँठ को सही जगह बांधती है, एक विश्वसनीय मित्र की तरह l इसमें प्रकाशित निबन्ध बताते हैं कि वैवाहिक जीवन का आरंभ भावुकता में होता है, पर उसकी पूर्णता यथार्थ ही है l भावुकता और यथार्थ में सामंजस्य स्थापित करने की कला ही सुखमय दाम्पत्य जीवन की कुंजी है l इस पुस्तक में एक निबन्ध है ‘घर की तीन कुंजियाँ’ l प्रभाकर जी ने इसमें जिन तीन कुंजियों का जिक्र किया है वे हैं ‘रहना’, ‘सहना’, और ‘कहना’ l इनका विस्तार तो आप जब इस पुस्तक को पढेंगे तभी पता लगेगा, लेकिन उन्होंने  बताया कि इन तीन कुंजियों की तरह ही घर के मुख्य तीन अंग होते हैं पति, पत्नी, और बालक l ये तीनों आपस में सद्भाव से रहें, प्रेम से रहें, और एक दूसरे के साथ सहयोग से रहेंl अब तीन व्यक्तियोँ के आचार, विचार, आदतें एक समान तो नहीं हो सकती नl यदि ये आदतें पुरानी हों तो उन्हें छोड़ देना भी कोई आसान काम नहीं l अब साथ रहना है तो इसका कोई उपाय भी होना ही चाहिए, और वो उपाय ‘प्रभाकर’ जी ने बताया ‘सहना’, एक दूसरे की उन आदतों को जो हम समझते हैं कि अच्छी आदतें नहीं हैं l अब बात आई ‘कहने’ की l साथ रहेंगे तो कुछ न कुछ कहना भी पड़ेगा l अब ये जो ‘कहना’ है, क्या कहना है, कब कहना है, किसे कहना है – इसकी समझदारी भी तो होनी ही चाहिए l ‘प्रभाकर’ जी ने इन तीनों कुंजियों को अपने इस निबन्ध में बहुत ही सशक्त उदाहरणों के माध्यम से चित्रित किया है l

आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पंडित कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी रिपोर्ताज़ विधा के जनक माने जाते हैं। आज live telecast के टीवी  युग में उनके रिपोर्ताज़ और अधिक याद आते हैं। जो दृश्य उन्होंने खींचे हैं उनका live telecast प्रभाकर जी के शब्दों में है। कांग्रेस के कितने अधिवेशनों का आंखों देखा सीधा प्रसारण, आज़ादी की लड़ाई के अमूल्य दृश्यों का लाइव टेलिकास्ट उनके रिपोर्ताज़ में सुरक्षित है। उनके लिखे संस्मरणों में कितनी प्रेरणास्पद जीवनियों और बलिदानों के अभिलेख सरस भाषा में इतिहास के लिये सुरक्षित कर दिये गये हैं और निबन्धों में व्यक्ति, परिवार, राष्ट्र और विश्व के लिये आदर्शों के दीपक पथ के दोनों ओर जला दिये गये हैं, ताकि रौशनी हमेशा उपलब्ध रहे। इसी कारण वे अपनी पीढ़ी के लिए प्रिय और नई पीढ़ी के लिए पूज्य बने रहे हैं। आइये देखते हैं चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र पर उनके एक लेख का यह अंश उनकी पुस्तक “कारवां आगे बढ़े” सेl

“एक बार भारत के एक नागरिक योरोप के किसी देश में रेल से यात्रा कर रहे थेl उन्होंने अपने दोनों पैर बूट समेत सामने की सीट पर रखे हुए थे जो उनके लिए साधारण सी बात थी, क्योंकि हमारे देश के सभी पढ़े-अनपढ़े ऐसा ही करते हैं l उनके पास बैठे थे एक बूढ़े सज्जन l उनहोंने अपने ओवरकोट की जेब से पुराने अखबार का साफ़ कटा-छंटा एक टुकड़ा निकाला और भारत के नागरिक से कहा – “कृपा कर जरा पैर ऊपर उठाइयेl” इन्होंने पैर ऊपर उठाये, तो उनहोंने इनके पैरों की जगह वो कागज रख दिया और नम्रता से कहा “अब आप पैर रख लीजिये l इस तरह आपके आराम में खलल भी नहीं पड़ेगा और मेरे देश की यह चीज- सीट की गद्दी भी खराब नहीं होगी l”   सम्भव है आपने यह दृष्टांत पहले भी कहीं पढ़ा हो l

‘प्रभाकर’ जी के निबंधों में प्राणदायी संजीवनी सी शक्ति थी l ये निबन्ध कहने को तो निबंध हैं, लेकिन ये संस्मरण भी हैं, कहानी भी हैं, अनुभव भी हैं, विचार भी हैं, उपदेश भी हैं और इन सबसे बढ़कर एक सहृदय, सत्पुरुष, हितैषी, और प्रेमी मित्र की रसभरी बातें हैं जो हृदय से निकल कर पाठक के हृदय में समा जाती हैं l दूसरे शब्दों में, ये मन की मुरझाती तुलसी को, उदासी से प्रसन्नता के, अवसाद से आल्हाद के, हताशा से उद्यम के, अकर्मण्यता से कर्मण्यता के असफलता से सफलता के लहलहाते उपवन में लाकर रोप देते हैं l इस कथ्य के समर्थन में आइये एक घटना का साक्षात्कार आपसे करवाता हूँ ……

  • “स्थान है पटना का रेलवे स्टेशन l एक व्यक्ति जिंदगी से तंग आकर, परेशान हो कर ट्रेन की पटरी पर कटकर आत्महत्या करने के इरादे से आता है l ट्रेन के आने में अभी कुछ समय शेष था l व्यक्ति अपनी जेब में हाथ डालता है तो पाता है एक अठन्नी उसकी जेब में है l वह प्लेट्फ़ॉर्म पर आता है और ‘नया जीवन’ नामक एक पत्र खरीदता है और उसमें पढ़ता है, पंडित कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी का लिखा एक ललित निबंध ‘धीरे-धीरे जिओ’ l ऐसा प्रतीत होता है कि ‘प्रभाकर’ जी का यह निबन्ध जैसे बस उसी के लिए लिखा गया थाl उनके लिखे इस निबंध को पढ़कर उस व्यक्ति के मानस पटल पर ऐसा जादू हुआ कि उसने आत्महत्या करने का विचार त्याग दिया और नई ऊर्जा के साथ जीवन को फिर से जीने का संकल्प ले वापस चला गया l”  यह ललित निबंध ‘प्रभाकर’ जी की“ जिन्दगी मुसकरायी” नामक पुस्तक में प्रकाशित हैl

उदात्त आदर्श को सामने रख कर साहित्य रचने वाले साहित्यकार ‘प्रभाकर’ जी की कलम, ओछे समझौते नहीं कर सकती। उसे तो सूली पर लटकते हुए भी अपनी कलम की धार और पैनी करनी होती है और यही ‘प्रभाकर’ जी ने किया भी। एक लेखक की भूमिका के प्रति उनका दायित्व बोध कितना गम्भीर था आइये देखते हैं इसका एक उदाहरण ……

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पंडित नेहरु जी ने उनसे एक बार पूछा “प्रभाकर, आजकल क्या कर रहे हो ?” इस पर उनका उत्तर था ..”आपके और अपने बाद का काम कर रहा हूँ l” नेहरु जी ने चौंक कर पूछा“ इसका मतलब क्या हुआ?” तो प्रभाकर जी ने जवाब दिया कि “पंडित जी, आज देश की शक्ति पुल, बाँध, कारखाने, और ऊंची-ऊंची इमारतें बनाने में लगी हैं l ईंट – चूना तो ऊंचे होते जा रहे हैं और आदमी नीचा होता जा रहा है l भविष्य में ऐसा समय आएगा, जब देश का नेतृत्व ऊंचे मनुष्यों के निर्माण में शक्ति लगाएगा, तब जिस साहित्य की आवश्यकता देश को पड़ेगी, उसे लिख-लिख कर रख रहा हूँ l”

‘प्रभाकर’ जी साहित्य के माध्यम से गुणों की खेती करना चाहते थे और अपनी पुस्तकों को शिक्षा के खेत मानते थे,जिनमें जीवन का पाठ्यक्रम था l वे अपने निबन्धों को विचार यात्रा मानते थे और कहा करते थे “इनमें प्रचार की हुंकार नहीं, सन्मित्र की पुचकार है जो पाठक का कंधा थपथपा कर उसे चिंतन की राह पर ले जाती है l”

एक लघुकथा ‘रजकण’ इसी परिप्रेक्ष में देखिये…

  • लक्ष्मी पुत्र ने मार्ग में पड़े रजकण से अभिमान के स्वर में कहा “मैं लक्ष्मीपुत्र हूँ l वैभव की आकर्षक किरणें मेरे चारों ओर छिटका करती हैं, गुणीजन मेरे चारों और मंडराया करते हैंl मैं अनेक का भाग्य-विधाता, सम्मान तथा सुख का अक्षय अधिपति हूँ !
  • उपेक्षा के स्वर में रजकण ने कहा –“मैं रजकण हूँ ! इस पथ में आने – जाने वाले संतों और दीवानों का चरण-चुंबन कर अपने आपको कृतार्थ किया करता हूँ ! यही मेरी निधि है ! हृदय के आँचल में अपना यह सुख बटोरे मैं आनंद के राग गाता रहता हूँ l”
  • लक्ष्मी-पुत्र ने अहंकार का तीखापन कंठ में ले घृणा के स्वर में कहा “ यह सब दरिद्री के मन को समझाने की बातें हैं ! लोमड़ी के लिए अंगूर खट्टे होते ही हैं l”
  • अपने स्वर को तनिक पैना कर रजकण ने कहा“ यहीं पड़े-पड़े मैंने अनेक लक्ष्मी-पुत्रों को भिखारी के रूप में जाते देखा है अभागे अभिमानी !”

‘प्रभाकर’ जी ने जहाँ “विकास”, “ज्ञानोदय”, और“नया जीवन” का सम्पादन किया वहीँ विभिन्न जीवनोपयोगी विषयों पर ढेरों पुस्तकें लिखी l “जिन्दगी मुसकरायी”, “बाजें पायलिया के घुंघरू”, “जिन्दगी लहलहाई”, “महके आँगन – चहके द्वार”, “दीप जले शंख बजे”, “माटी हो गई सोना”“ आकाश के तारे धरती के फूल”, क्षण बोले कण मुसकाये” और कारवाँ आगे बढ़े” उनकी वे बहुचर्चित पुस्तकें हैं जो भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित हैं और हर उस व्यक्ति के पास मिलेंगी जिसे पुस्तकों से प्रेम हैl

वर्ष1990 में भारत के राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरामन ने अपने कर कमलों से उन्हें‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। ‘प्रभाकर’ जी के कोश में सम्मान और पुरस्कारों की एक लम्बी सूची है जो समय-समय पर उन्हें प्रदान किये गये हैं। उनके साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुये हैं और अभी भी चल रहे हैं। 89 वर्ष का संघर्षपूर्ण और नितांत अनुकरणीय जीवन जी कर 9 मई 1995 को “प्रभाकर जी” परलोक यात्रा पर चले गए l

कश्मीर सिंह
55- न्यू गोपाल नगर
नुमाइश कैंप, सहारनपुर
247001, (उ०प्र०)

4 COMMENTS

  1. सुशांत जी,
    आपने एक page create किया है ‘कश्मीर सिंह का रचना संसार’ यदि इस page को क्लिक करने पर मेरी सारी कहानियाँ वहां उपलब्ध हो जाएँ तो यह पाठकों के लिए अच्छा होगा ।

  2. आपका पुनः हार्दिक आभार ।

    सादर
    कश्मीर सिंह

  3. आपका हार्दिक आभार सुशांत जी की आपने मेरे इस तुच्छ प्रयास को thesaharanpur. com पर स्थान दिया ।

    पुनः आभार ।

    • अच्छे लेख, अच्छी कहानियां और कविताएं तो हर किसी को चाहियें काश्मीर सिंह जी, सो हम भी अपवाद नहीं हैं । आप की रचनाओं का सदैव स्वागत है और आप के इस सहयोग के लिये हम सदैव आभारी हैं।

      सुशान्त सिंहल

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