साक्षात्कार – श्री आर.पी. शुक्ल (भाग १)

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DSC01927श्री आर.पी. शुक्ल से हम सभी परिचित ही हैं! बहुत कम प्रशासनिक अधिकारी इतने सौभाग्यशाली होंगे जिनको न केवल अपने कार्यकाल में, बल्कि सेवा निवृत्ति के बाद भी जनता से इतना प्यार व सम्मान बदस्तूर मिलता रहे। सहारनपुर के मंडलायुक्त के रूप में जब श्री शुक्ल यहां पर कार्यरत थे तो उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों से हमारा परिचय होता रहा जैसे – कथाकार, गीतकार, हायकुकार, चित्रकार, मूर्तिकार, कुशल वक्ता, मौलिक सोच रखते हुए विकास पुरुष की छवि अर्जित करने वाले कर्त्तव्यनिष्ठ प्रशासक और साथ ही एक अत्यन्त सहृदय व्यक्ति जो चाय बेचने वाले एक बच्चे भोलू की खुददारी से प्रभावित होकर उसको गोद लेकर उसका जीवन संवारने का प्रण ले लेता है, एक गरीब की बिटिया की शादी कराने के लिये दहेज व बारात के स्वागत सत्कार का न केवल खुद प्रबन्ध करता है, बल्कि कन्यादान भी करता है।

श्री आर.पी. शुक्ल आजकल लखनऊ में ही अपने परिवार के साथ रहते हैं और ’विश्वपटल’ नामक हिन्दी पत्रकारिता के संस्थापक संपादक व प्रकाशक हैं। पिछले सप्ताह उनके सहारनपुर आगमन के दौरान डा. वीरेन्द्र आज़म के साथ उनसे भेंट का सुअवसर मिला तो हम दोनों ही उनसे कुछ प्रश्न पूछने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उनसे हुई बातचीत के संपादित अंश हमारे पाठकों हेतु यहां प्रस्तुत हैं !

संपादक – शुक्ल जी, आप कई दशकों तक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्य करते रहे, सेवा निवृत्त होने के बाद कुछ दिन राजनीतिक अखाड़े में भी दांव-पेंच लड़ाये और अब आपने ’विश्वपटल’ मासिक पत्रिका आरंभ करके एक नयी पारी खेलनी आरंभ की है। कैसा लग रहा है आपको? इन तीनों ही रूपों में आपको अपनी कौन सी पारी सबसे अधिक प्रभावी लगती है?

शुक्ल – ’प्रभावी’ की यदि बात करें तो निस्संदेह प्रशासनिक अधिकारी के रूप में मुझे अपने देश और समाज की सेवा का बहुत अच्छा सुअवसर मिलता रहा है और मैने उसका यथाशक्ति उपयोग भी किया है। अब रिटायर हो जाने के बाद मेरे जैसे पूर्व अधिकारी केवल सुझाव ही दे सकते हैं, ये वर्तमान अधिकारियों की इच्छा पर निर्भर है कि वह हमारे सुझाव को मानें या न मानें। राजनीति में तो बस जाना और आना ही रहा, वहां टिक नहीं पाया । और अब ये ’विश्वपटल’ पत्रिका अपनी शैशवावस्था में ही है। जो भी हो, मैं जीवनपर्यन्त समाज के लिये उपयोगी बने रहना चाहता हूं और यह पत्रिका मेरी इसी इच्छा को ही प्रतिध्वनित करती है।

संपादक – राजनीति में जाने की क्या वज़ह थी और फिर वापिस आ जाने की वज़ह क्या रही?

शुक्ल – हमारे देश में राजनीतिज्ञों के हाथ में इतनी शक्तियां हैं कि यदि वह चाहें तो समाज हित में असीमित कार्य कर सकते हैं, बल्कि चमत्कार भी कर सकते हैं! मेरी सेवा निवृत्ति की आयु भले ही आ गई थी किन्तु मेरी मानसिक और बौद्धिक क्षमताएं आयु के साथ कम हो गयी हों, ऐसा नहीं था। मुझे लगा कि मैं प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम करना जारी नहीं रख सकता तो क्यों न राजनीतिक पटल पर कुछ सार्थक कार्य करने का प्रयास करूं ! परन्तु वहां मुझे अपने योग्य काम नहीं मिला अतः वापिस चला आया।

संपादक – परन्तु आप राजनीति में रहे ही कितने दिन? राजनीति में यदि शीर्ष से आरंभ करने की इच्छा है तो आपको नेहरू – गांधी, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव,  सिंधिया, पायलट या चौ. चरण सिंह के परिवार में जन्म लेना होता है,  वरना बाकी सबको तो जमीन से ही संघर्ष करते हुए ऊपर उठना होता है। आप आज कोई राजनीतिक पार्टी में शामिल हों तो ये उम्मीद तो नहीं कर सकते कि वह आपको पहले ही दिन सांसद या विधायक बना देगी! राजनीति में ऊपर उठने के लिये और अपनी जगह बनाने के लिये मेहनत तो करनी ही पड़ेगी!

शुक्ल – यह तो मैं भी मानता हूं। मुझे पहले ही दिन सांसद या विधायक बना दिया जाये, ऐसी मेरी कोई अपेक्षा भी नहीं थी परन्तु मुझे लगा कि यहां स्थापित नेताओं के लिये मैं सिर्फ एक और समर्थक हूं इससे अधिक कुछ नहीं।  मुझे भी सिर्फ वही करना होगा जो वह चाहते हैं।  मैं अपने लिये अपना एजेंडा स्वयं निश्चित नहीं कर सकूंगा, मुझे अपने नेता के एजेंडे पर ही चलना होगा फिर चाहे वह मुझे सही लगे या गलत ! जिस दिन यह एहसास हुआ, बस उसी दिन समझ लिया कि मैं किसी भी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता नहीं बन सकता। यदि मैं युवा होता तो शायद कार्यकर्ता बन भी जाता पर अब नहीं। यदि मेरी क्षमताओं व अनुभव का वहां कोई उपयोग नहीं है तो फिर राजनीति मेरे लिये सही जगह नहीं है।

संपादक – पिछले कुछ दशकों में अनेक सम्मानित हिन्दी पत्रिकाएं एक के बाद एक बन्द होती चली गई हैं। जो हैं भी, वह मूल अंग्रेज़ी संस्करण का अनूदित हिन्दी संस्करण मात्र हैं। क्या आपको लगता है कि ’विश्वपटल’ हिन्दी पत्रिकाओं के प्रतिकूल ऐसे वातावरण में अपने लिये स्थान बना पायेगी? वैसे भी, समाचार पत्रों व पत्रिकाओं को लंबे समय तक जीवित रहने के लिये विज्ञापन की आवश्यकता होती है।

शुक्ल – मैने पत्रिका का संपादन – प्रकाशन शुरु करने से पहले बहुत सारे मित्रों व शुभचिन्तकों से बात की थी और उनकी राय ली थी। इस विचार मंथन में से जो बात निकल कर आई, वह ये कि कुछ पत्रिकाएं ’साहित्यिक’ श्रेणी में हैं, तो कुछ ’राजनीतिक’ हैं, कुछ खेलकूद को समर्पित हैं तो कुछ महिलाओं के विषय तक ही स्वयं को सीमित रखती हैं। संभवतः ऐसी पत्रिका कोई नहीं होगी जो सब प्रकार के पाठकों के लिये रुचिकर व उपयोगी जानकारी सरल व सरस भाषा में, सीमित मूल्य में उन तक पहुंचाये। हमें उम्मीद है कि हम अपने इस प्रयास में सफल होंगे। आप जैसे शुभचिन्तक मित्रों का सहयोग हमें मिलता रहे, यह हमारी आकांक्षा है।

संपादक – संपादक अपनी ’रद्दी की टोकरी’ के लिये बहुत कुख्यात होते हैं। नये-नये लेखकों, कवियों को तो संपादक की मेज़ के नीचे रखी हुई रद्दी की टोकरी से बहुत भय लगता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इतने साल तक कथाकार, लेखक और कवि की भूमिका में रहने के बाद अब आप यह सोच कर संपादक बन बैठे हों कि अब मैं भी लोगों की रचनाएं रद्दी की टोकरी में डाल – डाल कर बदला लिया करूंगा?

शुक्ल – (खिलखिलाकर हंसते हुए) नहीं नहीं ! ऐसा नहीं है। एक तो मेरी कोई रचना किसी संपादक ने कभी वापिस नहीं की और न ही डस्टबिन में डाली अतः बदला लेने की कोई भावना मन में कभी आई ही नहीं और दूसरे, हम प्राप्त होने वाली सभी रचनाओं के साथ पूरा न्याय करते हैं। जरूरत पड़े तो रचनाकार से फोन पर संपर्क भी कर लेते हैं। आप भी अपनी रचनाएं निस्संकोच हमें भेजें, आपका स्वागत है।

संपादक – धन्यवाद ! आजकल कुछ लेखक और कवि केन्द्र सरकार के प्रति नाराज़गी व्यक्त करने के लिये अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं। क्या आपको यह पुरस्कार लौटाना सही लगता है?

शुक्ल – पुरस्कार वापसी के कारण शुद्ध राजनीतिक हैं। केन्द्र सरकार ने मेरी जानकारी में अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है कि किसी कवि, लेखक या रचनाकार को क्षुब्ध होकर अपना पुरस्कार वापिस लौटा कर प्रतिरोध व्यक्त करना पड़े। इस देश में अनेकानेक ऐसी घटनाएं घटित होती रही हैं, जब इन साहित्यकारों को अपना क्षोभ व्यक्त करने के पर्याप्त व उचित अवसर थे पर तब इन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया और अब कर रहे हैं जबकि सरकार के स्तर पर ऐसा कोई अनुचित कार्य किया ही नहीं गया है।

(क्रमशः)
श्री आर.पी. शुक्ल से बातचीत अभी जारी है जिसमें उन्होंने स्मार्ट सिटी सहारनपुर सहित अनेकानेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी बेबाक राय व्यक्त की।  अगले अंक में आप पढ़ेंगे प्रतिष्ठित पत्रकार डा. वीरेन्द्र आज़म के सवाल और श्री आर.पी. शुक्ल के जवाब!  

5 COMMENTS

  1. Very Inspiring, The way you ask the Question with light vocabulary and the way Shukla sir answered, that is very inspiring. Love to read such interview. That look local and beautiful.

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