भारतीय स्वातंत्र्य संघर्ष – एक पठनीय दस्तावेज़

सैय्यद अहमद खां का नया चेहरा दिखाती है ‘‘भारतीय स्वातन्त्र्य संघर्ष ’’

0
594
azam-picture
डा. वीरेन्द्र आज़म – समीक्षक

आज़ादी के आंदोलन का इतिहास जितना गौरवपूर्ण है उतना ही विस्तृत भी। इतिहासकारों ने अनेक ग्रन्थ और पुस्तकें इस विषय पर लिखी हैं। लेकिन इसके बावजूद भी स्वातन्त्र्य संघर्ष की अनेक कहानियां ऐसी है जिन्हें न तो लिखा गया है और न कहीं कहा गया है। हाल ही में बसंत सिंह की इस विषय पर प्रकाशित पुस्तक ‘‘भारतीय स्वातन्त्र्य संघर्ष’’ चर्चाओं में है। आकर्षक मुख पृष्ठ, साफ-सुथरा मुद्रण और पुस्तक की सरल-ग्राह्य भाषा पाठक में पुस्तक अध्ययन की भूख जगाती है। मुख पृष्ठ पर प्रकाशित गांधी जी की दांडी यात्रा के अलावा गोखले, तिलक, मदनमोहन मालवीय, सरोजनी नायडू, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पं. नेहरु, लालबहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि के चित्र देखते ही पाठक को पुस्तक की विषय वस्तु और उसके महत्व का सहज ही ज्ञान और भान हो जाता है।

सहारनपुर की साहित्यिक संस्था ‘समन्वय’ द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में करीब 210 पृष्ठ की विषय सामग्री को 12 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। इतने कम पृष्ठों में 1857 से 1947 तक यानि करीब नौ दशक के आज़ादी के आंदोलन को समेटने का जो कौशल लेखक ने दिखाया है, उसे सिंधु को बिंदु में समेटने का प्रयास ही कहा जायेगा। लेखक ने पुस्तक की विषय वस्तु की मौलिकता पर साफ कहा है-

‘‘इस पुस्तक में स्वातन्त्र्य प्राप्त करने से संबधित विषय वस्तु, घटनाक्रम और जो विवरण अपनी शैली में मैंने प्रस्तुत किये हैं निश्चित ही इनका मैं रचयिता या विधाता नहीं हूं। मैंने विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सार पुस्तक रुप में आपके समक्ष प्रस्तुत किया है।’

लेखक ने पुस्तक लेखन का अपना मंतव्य भी स्पष्ट किया है-

इस पुस्तक को लिखने का मेरा उद्देश्य मात्र यही रहा है कि मैं इस घटनाक्रम को सहज शैली और संक्षेप में प्रस्तुत करुं,…..हमारा जन्म ऐसे वर्षो में नहीं हुआ कि हम भी अपना योगदान इस संघर्ष में कर पाते, परंतु फिर विचार आता है कि कुछ देशवासियों ने भगीरथ प्रयत्न करके स्वातन्त्र्य हमारे लिये प्राप्त की, कुछ ने इसे अपनी रात और दिन का चैन खोकर स्थायित्व दिया और अब इस पीढ़ी के समक्ष इस स्वातन्त्र्य को संरक्षण देने, दृढ़ बनाने और अपने कार्यकलापों से इसे पुष्पित और पल्लवित करने का कर्तव्य बिल्कुल स्पष्ट है।…………..जिससे यह पीढ़ी इसे पढ़कर स्वातन्त्रय संघर्ष से परिचित और अनुप्राणित हो सके।’’

लेखक ने प्रथम अध्याय में जहां 1857 की क्रांति, नानाजी, तात्या टोपे, बिठुर का अजीमुल्ला खां, रानी झांसी लक्ष्मीबाई, मौ.बख्त खां, अवध के नवाब वाजिद अली शाह व शाहबाद के कुंवर सिंह सहित आजादी के अनेक दीवानों की घटनाओं का उल्लेख किया है वहीं दूसरे अध्याय ‘पुनर्जागरण’ में राजा राममोहन राय से लेकर स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ऐनी बेसेन्ट, वलीउल्ला खां, सैय्यद अहमद खां आदि से संबद्ध घटनाओं को कलमबद्ध किया है। अन्य अध्यायों- राष्ट्रवाद का उदय और उसका स्वरुप, बंग-भंग और राष्ट्रीय आंदोलन के बदलते तेवर, उग्र राष्ट्रवाद, असहयोग एवं खिलाफत नेतृत्व गांधी जी, साईमन कमीशन और नमक सत्याग्रह, अधिनियम 1935-मुस्लिम राजनीति और क्रिप्स, करो या मरो, गांधी का आमरण अनशन और मुस्लिम राजनीति के पैंतरे, कैबिनेट मिशन और जिन्ना की हठधर्मी तथा अंतिम अध्याय ‘विभाजन और स्वतंत्रता’ में लेखक ने सैकड़ों घटनाओं का उल्लेख किया है। घटनाओं को ज़्यादा विस्तार भले ही न मिला हो लेकिन कमोबेश उन्हें छुआ अवश्य गया है। इस सारी विषय वस्तु के रोचक प्रस्तुतिकरण को देखते हुए कहा जाना चाहिए कि लेखक अपने उद्देश्य में लगभग सफल रहा है।

बसंत सिंह की पुस्तक ‘‘भारतीय स्वातन्त्र्य संघर्ष’’ अपने दूसरे अध्याय ‘पुनर्जागरण’ में सैय्यद अहमद खां के संबंध में दिए गए तथ्यों को लेकर काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। सच तो यह है कि सैय्यद अहमद खां का जो चेहरा आम आदमी को दिखता है उसमें ब्रिटिश सरकार के समर्थक व मुसलमानों के राजनैतिक तथा शैक्षिक उत्थान के लिए समर्पित एक शिक्षाविद् और समाजसुधारक का चेहरा दिखता है लेकिन यह पुस्तक सैय्यद अहमद का एक नया चेहरा दिखाती है जिसमें वह सद्भाव और हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रुप में सामने आते है। पुस्तक में उनके संबंध में दिए गये कुछ तथ्य देखिए- ‘ 27 जनवरी 1883 में पटना  की एक सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘‘ हम दोनों हिन्दुस्तान की हवा में सांस लेते हैं और गंगा-जमुना के पवित्र जल को पीते हैं, हम दोनों ही हिन्दुस्तान की जमीन की उपज से अपनी भूख मिटाते हैं। हम एक साथ जीते और मरते हैं, भारत में रहने के कारण हमने अपना रक्त और रंग बदल दिया और हम एक हो गए। हमारे चेहरे मोहरे  भी एक हो गए, मुसलमानों ने बहुत से हिन्दू तौर तरीके अपनाये और हिन्दुओं ने भी बहुत से मुसलमानी आचरण ग्रहण किए। हम इतने मिलजुल गए कि हमने नई उर्दू भाषा विकसित की जो न हमारी भाषा थी और न ही हिन्दुओं की भाषा थी। इसलिए यदि हम अपने जीवन के उस हिस्से को छोड़ दें जो ईश्वर का है यानि धर्म, तो निसंदेह इस तथ्य को मानना पड़ेगा कि हमारा देश एक है, कौम एक है, देश की तरक्की और भलाई तथा हमारी एकता परस्पर सहानुभूति और प्रेम पर निर्भर है। अनबन, झगड़े, टंटे और फूट हमें समाप्त कर देंगे।’ सैय्यद अहमद खां ने हिन्दुओं और मुसलमानों को एक सुन्दर दुल्हन की दो ऑंखें बताया और कहा कि, ‘इनमें से यदि किसी एक को चोट पहुंचे तो चेहरा बिगड़ जायेगा’।’’

पुस्तक के लेखक पेशे से अधिवक्ता है लेकिन पुस्तक की विषय वस्तु यह साक्ष्य देती है कि लेखक ने आज़ादी से सम्बद्ध इतिहास का गहन अध्ययन किया है और लेखक अपने उद्देश्य के अनुरुप अपने भावों की अभिव्यक्ति और घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में सफल रहा है। इस दृष्टि से पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ी है।

लेखक-बसंत सिंह एडवोकेट
समीक्षक -डॉ. वीरेन्द्र आज़म
प्रकाशक-‘समन्वय’सहारनपुर वर्ष 2016
मूल्य – 

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY