एक ख़त उसके नाम (कहानी)

दाम्पत्य की पहेलियों को कुरेदती, मीनाक्षी एच. वर्मा की कलम से एक मार्मिक कहानी

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“कैसे हो?”

खत की पहली पंक्ति पढ़ते- पढ़ते पूरे बदन में सिहरन की लहर दौड़ गयी।

‘‘अचानक आज इस तरह…. हैरानी हो रही है न? पर सच मानों, बस लिखा ही आज है। बाकी सब वही है।”

इसका क्या मतलब…? मन में हजारों ख्याल पल भर में गोते लगा गए।

‘‘कहाँ हो पता नहीं। क्या कर रहे हो -यह भी नहीं मालूम। मन उद्विग्न था, सोचा तुमसे बेहतर कौन समझ पायेगा। आज तुम्हारी बहुत याद आ रही थी। बहुत कुछ कहने को मन चाह रहा था। कहना जरुरी भी था। तुम सोच रहे होंगे कि ऐसा भी क्या।”

उसे लगा ‘‘हाँ, और क्या? कैसे बताऊँ ? मन की अकुलाहट बढ़ती ही जा रही थी। आज इस खत का एक-एक अक्षर नीलेेश को पहेली की तरह लग रहा था। वह आगे पढने लगा। पलक झपकना शायद भूल गया था। उसकी आँखो के आंसू शर्ट की बटन-पट्टट्टी के दोनो ओर उसकी छाती को गीला होने का अहसास करा रहे थे, लेकिन उसे लग रहा था कि हदय पर सालों से जमी धूल की परत जैसी यादें उन आँसुओं से बखूबी धुली जा रही थी।

‘‘आज तुम मेरे पास होते, तो तुम्हारी दोनो हथेलियों से अपना चेहरा ढककर युगों तक रोती। तब तुम्हारे होंठ मेरे मस्तक पर प्रेम की अलक जगाते और मैं मोम की तरह पिघलकर तुम्हारे चरणों पर गिर जाती। अपनी अंजुलि में तुम्हारे प्रिय फूल भरकर तुम्हें समर्पित करती। और फिर…।”

सुगन्धा तो इतनी भावुक कभी न थी! कभी बताया भी नहीं! जब अलग हुए, तब भी….। नीलेश पिंजरे के पंछी की तरह छटपटा रहा था, जो उड़ना चाहते हुए भी उड़ नहीं पाता।  मन किया कि इतनी जोर से चीखे कि सुगन्धा जहाँ भी हो, उसकी आवाज को सुन ले। उससे पूछे,‘‘ सुगन्धा, तुम हो कहाँ?“ ख्यालों को झटककर वह आगे का पत्र पढ़ने लगा।

‘‘… तुम मुझे दोनो हाथों से पकड़कर उठाते और पूछते- क्या हुआ ? नीलेश, क्या तुम नहीं चाहते कि ऐसा हो?  चाहोगे भी क्यों ? तुमने चाहा होता तो हम अलग क्यों होते? विवाह के तीन साल बाद अलग होना और आज चौदह साल बाद तुम्हारा इस तरह मेरा पत्र पढ़ना- सब प्रारब्ध है क्या ? मन मानने को तैयार नहीं होता। कभी-कभी सोचती हूँ कि तुम प्रेम करके भी प्रेम को समझ नही पाए। किन्तु ऐसा कहना प्रेम का अपमान होगा, तुम पर आरोप होगा। शायद गलती मेरी थी। शायद क्या, मेरी ही थी। पर कुछ ठीक नहीं हुआ।”

नीलेश पत्र पढ़ते-पढ़ते कब धम्म से सोफे पर गिरा, उसे स्वयं भी पता नहीं चला। ”हाँ, ठीक तो नहीं हुआ“ – उसने सोचा। अब कुछ क्षणों की लिये वह पत्र पढ़ना भूल ही गया था।

‘‘तुम चाहते तो हाथ पकड़कर रोक सकते थे। एक बार कह सकते थे कि ऐसे कैसे जा सकती हो ? तुमने मुझ पर अधिकार ही नहीं समझा। सम्बन्धों में स्वतन्त्रता ठीक है। पर क्या इतनी कि एक-दूसरे पर प्रेम रखने का अधिकार ही गौण हो जाए ? गलत कह रही हूँ क्या ? मीनल आज चौदह वर्ष की हो गयी।“

क्या ? नीलेश अब फटी आंखो से पत्र पढ रहा था। उसके मन में हूक उठी। आज यह पिता होने का पहला अहसास था। उसे लगा कि वह दुनिया का सबसे अभागा पिता है। जब से सुगन्धा उससे अलग हुई उसने यह तो सोचा ही नहीं। उसे याद आया, जैसे कल की ही बात हो! सुगन्धा ने उससे कहा था कि वह पेट से है। जब तक इस जिम्मेदारी का अहसास होता, दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया। कारण?  कारण तो शायद वो भी नहीं समझ पाये थे। बस दोनों ही निर्णय लेने में समर्थ, सक्षम एवं स्वंतत्र थे। जैसे विवाह का फैसला लिया, वैसे ही अलग होनें का भी। उन्हें लगा कि उनका विवाह का निर्णय गलत था, तो उसे ठीक करने के लिए एक और निर्णय ले लिया। यह तो समझा ही नहीं कि एक गलत निर्णय दूसरे गलत निर्णय से सही नहीं हो सकता।

‘‘शाम को उसके दोस्त घर आए थे। सब अभी गये है। मीनल भी थक गयी थी। अपने कमरें में सोने गयी है। मैं जानती हूँ मेरा यह पत्र दीपक की उस फडफड़ाती लौ की तरह है, जिसमें तेल खत्म हो चुका है। कुछ क्षण और रोशनी देकर वह बुझ जायेगी। मेरा यह पत्र भी तुम्हें सूचित करने का एक अन्तिम प्रयास है। नीलेश,  जानते हो- चौदह वर्षो में आज पहली बार मुझे मीनल के पिता की आवश्यकता महसूस हुयी। सुगन्धा तो नीलेश की होकर भी, नीलेश के बिना जी रही थी!”

नीलेश की धड़कने बढ़ती जा रही थी। सुगन्धा जब उससे अलग हुई, तब उसने भी कहाँ चाहा था कि ऐसा हो। किन्तु वह ऐसा होने से रोक भी कहाँ पाया था। पर आज क्या करे नीलेश ? वह असमंजस में है। पिछले चौदह सालों में उसे लगने लगा था कि वह एक संवेदनहीन पुरुष है, जो बिना परिवार के पूर्णतः अपने लिए जी सकता है। किन्तु आज वह स्वयं को छला हुआ महसूस कर रहा था। वह सुगन्धा और मीनल से अलग कहॉँ हो पाया? उनसे दूर रहकर, उन्हे याद न करके, अपने आफिस और ऑफिस के कार्यो में व्यस्त रहकर वह उनसे अलग होने की कोशिश कर रहा था। नीलेश सुगन्धा के साथ बिताए आठ सालों को याद करके विचलित नही हुआ, किन्तु बाद के चौदह साल उसे नासूर जैसे दुःख रहे थे। उसे लगा कि काश ! यह जिन्दगी किसी फिल्म की तरह होती और रील घुमाकर भूतकाल में जाना सम्भव होता, तो वह सब ठीक कर देता। आज सुगन्धा उससे अलग होने का निर्णय लेती, तो वह कठोरता से न केवल उसे मना कर देता, बल्कि प्रेम से मना भी लेता। उसे लग रहा था कि कैसे पुरुष प्रधान समाज में जी रहा है वह, जहाँ वह अपनी प्रभुता से अपने परिवार को भी न बचा सका। नीलेश आज सोचने पर मजबूर था कि आखिर वह कैसी स्वतंत्रता थी, जिसे वह साथ रहकर भोग नहीं पा रहे थे। उसे लगा कि भाग्य ने उसे निरा मूर्ख सिद्ध कर दिया। स्वतंत्रता अलग नहीं, साथ रहने में है। जो प्रेम को समझ पाता है, वही स्वतंत्र हो जाता है। पति-पत्नि का रिश्ता निभाने में और प्रेम करने में अन्तर है। प्रेम कोई रिश्ता नहीं है, प्रेम का भी कोई रिश्ता नहीं है। प्रेम प्रत्येक रिश्ते का आधार है। जिस रिश्ते का आधार खोखला हो वो खूबसूरत दीवारों और छत के सहारे नहीं टिकता। आधार मजबूत हो तो दीवारें और छत खुद-बखुद मजबूत बन जाते हैं- सुन्दरता उस मजबूती  और टिकाऊपन में है। वह सोच रहा था- कैसे टूट जाते है रिश्ते और क्यों ? निस्तेज अश्रुपूरित आँखें फिर उस कागज पर  लिखी पंक्तियों में खो गयी।

‘‘मीनल जब छोटी थी, अपने पिता के विषय में पूछा करती थी । मैं उसे कुछ भी कहकर समझा देती थी लेकिन, जब वह तेरह वर्ष की हुई तो मैने उसे सच बता दिया। तबसे उसने तुम्हारे लिये कभी नहीं पूछा। आज मुझे अहसास हुआ कि जब वह छोटी थी, तुम्हारे बारें में पूछती थी, तो मैं तुमसे अलग होकर भी तुम्हारे साथ हो जाती थी। उसको जब समझाती थी कि तुम विदेश गए हो, दो साल बाद लौटोगे, तब शायद स्वयं को भी समझा लेती थी और सोचती थी कि काश! वे दो साल कभी पूरे हो जायें। जब उससे कहती थी कि रात तुम्हारे पापा आए थे, तुम्हारे लिए गिफ्ट लाए थे, और दिन में खरीदी वस्तुएं उसे तुम्हारे गिफ्ट कहकर दिखाती थी, तब अपनी खरीदी साड़ी भी तुम्हारा दिया उपहार समझकर पहनती थी।”

“पिछले एक साल में मीनल ने कभी तुम्हारे बारे में नहीं पूछा। मैने उसके लिए तुम्हारा कोई गिफ्ट नहीं खरीदा। आज अचानक उसके चौदहवें जन्म दिन पर मुझे तुम्हारी याद आयी। जब मैं चौदह वर्ष की हुई थी, तो मुझे मेरे पिताजी ने जीवन दर्शन की कुछ सूक्तियां समझायी थी। माँ ने उन पर मुहर लगाते हुए कहा था कि यदि मै इनका पालन कर पाऊँ तो यह उनका मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा उपहार होगा। आज मुझे लगा कि वह जीवनदर्शन बेटी को वास्तव में पिता ही सिखा सकता है। पिता बेटी को पुरुष प्रधान समाज में अपनी अस्मिता और अस्तित्व को बचाकर कदम जमाने का गुरुमंत्र दे सकता है। माँ समझाए तो उसमें अहम् लगता है। पुरुषों के प्रति एक अनकही ईष्या या घृणा झलकती है। वैसे भी एक परित्यक्ता माँ के सिखाए जीवनदर्शन का प्रभाव अधूरा ही होगा। जिसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सम्बन्ध अधूरा रह गया, वह दर्शन और पूर्णता की बात करें, तो बेटी कैसे समझेगी, यह सोचकर कांप उठती हूँ। तुम्हारे विरुद्ध बोलकर उसे तुम्हारे विरुद्ध नहीं कर सकती। आजतक मैं ही तुम्हारे विरुद्ध नहीं हो पायी। तुम्हारे पक्ष में बोलकर उसे स्वयं  के विरुद्ध नही कर सकती। हो सकता है,नीलेश, तुम्हें यह सब बातें निरर्थक और बेमानी लगे, किन्तु यह एक माँ के मन की दुविधाऐं और आकांक्षाएं हैं।  तुम्हारे साथ होती तो सब दूसरी तरह घटता। इन आकांक्षाओं से परे एक सुन्दर और पूर्ण जीवन होता। एक-एक दिन बीतता है और रात किसी भयावह पक्षी के डरावने डैने की तरह मेरे आस-पास मंडराती है। शमशान से आती किसी विकल चीख की तरह सन्नाटा मुझे भीतर से चीरता जाता है। ऐसे में तुम्हें कहाँ ढूढूँ, नीलेश? आज पिताजी की कही बातों का मर्म जान पायी हूॅ। उन्होंने कहा था कि नारी को शक्ति कहते हैं क्योंकि नारी शक्ति का रुप है। नारी दुर्गा है, नारी काली है। दुर्गा बनकर अगर नारी सृजन को सक्षम है तो काली बनकर विनाश में भी सक्षम है। नारी को अपनी शक्ति का मूल्य जानना अति-आवश्यक है। पर बेटी- ध्यान रहें शक्ति द्वारा सृजन और विनाश दोनो कल्याण हेतु निमित्त है। शक्ति शिव के बिना अपूर्ण है। जिस दिन तुम्हे लगे तुम शक्ति विहिन हो, तो जान लेना कि तुमने अपने शिव को खो दिया है । आज मुझे लग रहा है कि मैने अपने शिव को खोया है। तुम्हारे बिना जीना आज असम्भव लगता है, नीलेश। लौट आओ, जहाँ भी हो, मुझ तक लौटो। मेरे लिये न सही, मीनल के लिये वापिस आ जाओ। विवाह पूर्व के पांच साल और विवाहेतर तीन साल जो हमने साथ बिताए, उनकी भव्यता को याद करके लौटो, नीलेश। मेरी सारी गलतियों को भूलकर, एक माँ की  विनती पर, पिता बनकर…।”

नीलेश ढाई साल बाद आज अपने पुराने घर लौटा था। सुगन्धा का धूल में अटा पत्र अपने कमरे की मेज़ पर पड़ा देख भूख-प्यास सब भुला बैठा था!  यात्रा की थकान और पैतृक घर के एक-एक सामान, एक-एक दीवार को छूने की चाह सब गायब हो गयी थी। पत्र के दाहिने उपरी हिस्से पर दृष्टि गयी तो 6 मार्च 2009 तारीख पड़ी देख वह चिन्तित हो उठा। डेढ़ वर्ष पूर्व का पत्र!

‘‘मेरा झुकना तुम्हे पहले भी समझ नहीं आया था, शायद आज भी न समझ पाओ। तुम्हे लगे इसमें मेरा कोई स्वार्थ है, तो जान लो नीलेश-मेरा ही स्वार्थ है। एक माँ अपने बच्चों के लिए स्वार्थी हो सकती है। और मुझे लगता है कि बडे होते बच्चों के सामने पिता का अहम भी छोटा होता है। मुझसे ही तो नाराज हो, नाराज रह सकते हो। पर मीनल तो बेटी है तुम्हारी! उससे तो नाराज नहीं हो।”

प्रतीक्षारत
तुम्हारी सुगन्धा।

मीनल तो पंद्रह से उपर की हो गयी होगी। गोल चेहरा होगा, बिल्कुल उसकी तरह। नहीं सुगन्धा जैसा गोरा और सुन्दर। कद काठी अपनी माँ पर गई होगी। चंचल होगी। पढने में तेज। नीलेश का सीना गर्व से फूला जा रहा था। आते ही नहाने को सूटकेस से तौलिया निकाला था, तभी मेज़ पर पड़े पत्र पर निगाह गई थी।  सुगन्धा के हाथ से लिखा अपना नाम देखा तो सुध बुध ही खो गयी। पत्र को उलट-पलट कर देखा। एक फोन नं0 तक नही लिखा। बुदबुदाया, मानो कह रहा हो, ‘‘ सुगन्धा, तुम रहोगी मूर्ख ही। अपना फोन नं0 भी नही लिख सकती थी। और जितनी निश्चिन्तता के साथ नीलेश घर लौटा था, उतनी ही उद्वग्निता के साथ उसके कदम पत्र में लिखे पते के साथ जिन्दगी तलाशने निकल पड़े।

– डा. मीनाक्षी एच. वर्मा,
संप्रति – एसोसियेट प्रोफेसर
Dept. of Communications
Invertis University
Bareilly

Introduction of Dr. Meenakshi H.Verma

डा. मीनाक्षी एच. वर्मा - कहानी लेखिका
डा. मीनाक्षी एच. वर्मा – कहानी लेखिका
– डा. मीनाक्षी एच. वर्मा
Dr Meenakshi Harraw Verma is presently working as Associate Professor in the Department of Communication, Invertis University, Bareilly. She is a well travelled person who sees the world through the eyes of the sufferer and writes the experiences in form of stories, articles and poems. She writes both in Hindi and English. She received her education from Saharanpur, Hyderabad and later from Bareilly. Major part of her education has been done at Saharanpur. she completed her graduation and post graduation from MS College Saharanpur, later she did Post Graduate Diploma in teaching of English from English and Foreign Languages University, Hyderabad and PhD from MJP Rohilkhand University, Bareilly. With an experience of 18 plus years, she has more than 35 research publications and presentations to her credit in national and international journals and conferences.

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