काला धन और मनी लांडरिंग – आइये इसे समझें !

काला धन और गंदा धन दो अलग अलग समस्याएं हैं !

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हम सभी ने काले धन यानि ब्लैक मनी के बारे में सुना है। आजकल नेताओं के भाषणों में और मीडिया में काले धन का अक्सर ज़िक्र होता रहता है।  आयकर विभाग भी अक्सर काले धन पकड़ने की उम्मीद में छापे मारता रहता है।  एक और शब्द जो काफी प्रचलित हो रहा है वह है “मनी लांडरिंग” । लांड्री वह स्थान है जहां पर गन्दे कपड़े धो कर साफ किये जाते हैं। ऐसे में मनी लांडरिंग का अर्थ हुआ गन्दे धन को साफ करना।   आम तौर पर हम गन्दे धन और काले धन को समानार्थी समझ बैठते हैं जबकि ऐसा नहीं है।

काले धन से तात्पर्य हमारी उस आय से है जो हमने खाता – बहियों में नहीं दिखाई है और इस प्रकार अपनी उस आय को आयकर विभाग की नज़रों से छिपाने का प्रयास किया है ताकि आयकर न देना पड़े। मान लीजिये, कोई डॉक्टर अपनी क्लीनिक में दिन में 200 मरीज़ देखता है पर अपने खातों में सिर्फ 50 मरीज़ दिखाता है और 150 मरीज़ों के प्राप्त फीस का कोई ज़िक्र नहीं करता, तो इन 150 मरीज़ों से प्राप्त फीस काला धन है।  कोई दुकानदार कच्चे – पक्के हिसाब रख कर अपनी 50 लाख की बिक्री को मात्र 10 लाख दिखाये तो 40 लाख की बिक्री पर कमाई गयी आय काला धन है। इसी प्रकार यदि एक संपत्ति का बाज़ार मूल्य एक करोड़ रुपये है किन्तु बेचते समय विक्रय पत्र में उसकी कीमत मात्र 40 लाख रुपये दिखाई जाती है तो 60 लाख रुपये का लेन-देन काले धन के रूप में होगा।

यह काला धन लोग अपने बैंक खाते में भी आसानी से जमा नहीं कर पाते हैं क्योंकि बैंकों को भी रिज़र्व बैंक द्वारा आदेश दिये गये हैं कि वह एक निश्चित राशि से अधिक के नकद लेन देन की सूचना प्रति मास रिज़र्व बैंक को दें।  यदि थोड़ा – थोड़ा करके भी खाते में जमा किया जाये तो भी आयकर अधिकारी आय का स्रोत पूछ सकते हैं।  इस प्रकार ये काला धन बैंक के बाहर ही बाहर घूमता फिरता रहता है और बैंक में आता भी है तो एक के बजाय दस-बीस नामों से खाते खोल कर उनमें थोड़ी – थोड़ी राशि जमा की जाती है ताकि आयकर विभाग की निगाह उन खातों पर न पड़े।

काल्पनिक नामों से बैंक खाते खोलना अब बहुत कठिन हो गया है क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक के आदेश हैं कि सभी बैंक ग्राहकों को के.वाय.सी. (KYC) दस्तावेज़ देने होंगे यानि ग्राहक को बैंक खाता खोलते समय अपने नाम व पते का प्रमाण, अपना व्यवसाय, धन का स्रोत, पैन कार्ड नंबर व अपना फोटो देना होता है। डिजिटल तकनीक आ जाने के कारण अब सरकार व रिज़र्व बैंक के लिये यह आसान होता जा रहा कि वह विभिन्न खातों व लेन-देन पर निरंतर निगरानी रख सकें। आधार कार्ड से सभी बैंक खातों को जोड़ देने के भी आदेश दे दिये गये हैं ताकि सभी बैंक खातों के असली मालिकों की पहचान हो सके और उन खातों में होने वाले लेन-देन की भी निगरानी हो सके।

काले धन की तरफ हमारी सरकारें अब तक काफी दयालु रही हैं क्योंकि काला धन आर्थिक रूप से अति सम्पन्न व प्रभावशाली व्यक्तियों के पास ही होता है, गरीब इंसान के पास नहीं। सरकार में बैठे हुए मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के अलावा बड़े व्यापारियों व उद्यमियों के पास भी भ्रष्टाचार से कमाया हुआ अकूत काला धन एकत्र होता रहा है अतः चोर-चोर मौसेरे भाई कहावत को चरितार्थ करते हुए प्रभावशाली व राजनैतिक पहुंच रखने वाले वाले व्यक्तियों के काले धन पर आंच नहीं आती थी।  परन्तु वर्तमान सरकार ने डिजिटल तकनीक को बढ़ावा देते हुए इन सभी के पर कतरने का सार्थक प्रयास किया है और निरन्तर कर रही है।  अभी तक आयकर विभाग सिर्फ मध्यवर्ग के लोगों पर नकेल कस कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता था पर अब तथाकथित बड़े लोग व नेता भी दबाव में आ रहे हैं और उनके यहां छापे मारे जा रहे हैं।  मीडिया में अत्यन्त लोकप्रिय भ्रष्ट नेता लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार आजकल कालेधन के लिये मारे जा रहे छापों से बहुत परेशान है, यह आने वाले बेहतर दिनों का ही संकेत है।

काले धन से भी ज्यादा गंभीर समस्या गन्दे धन (dirty money) की है।  गंदे धन से आशय ऐसे धन से है जो किसी अपराध को अंजाम देने के लिये किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को दिया जाता है, या किसी अपराध से होने वाली आय / फीस / पुरस्कार के रूप में किसी व्यक्ति या समूह को प्राप्त होता है।  जहां काला धन बैंक खाते के बजाय तिजोरियों में / धरती में / दीवारों में / तहखानों में गुप्त रूप से छिपा कर रखा जाता है, वहीं अपराध से जुड़े गन्दे धन को बैंकों में जमा करने का प्रयास किया जाता है और बैंकों के माध्यम से ही,  एक खाते से दूसरे खाते में, एक शहर से दूसरे शहर में इस प्रकार भेजा जाता है कि वह सामान्य व्यापारिक लेन-देन प्रतीत हो और खुद बैंकों को भी पता नहीं चल पाये कि ये किसी अपराध से जुड़ा हुआ गन्दा धन है।

उदाहरण के लिये अगर कोई आतंकवादी ग्रुप किसी शहर में कोई आतंकवादी वारदात करने की योजना बनाता है तो कई महीने पहले से उस शहर में रहने के लिये कुछ आतंकवादी भेज दिये जाते हैं जो वहां अपराध की विस्तृत योजना बनाते हैं, मकान किराये पर लेते हैं या खरीदते हैं,  मोबाइल कनेक्शन व वाहन आदि खरीदते हैं, ए के 47 जैसे महंगे – महंगे हथियार चोरी-छिपे खरीदते हैं।  जरूरत हो तो वह सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को रिश्वत देने भी देते हैं ताकि उनका काम आसान हो सके।

स्वाभाविक रूप से ये सब काम करने के लिये उनको विशाल मात्रा में धन की जरूरत होती है जो उनको हवाला या बैंकों के माध्यम से दूसरे शहर से प्राप्त होता है और कई बार तो शत्रु देश द्वारा भेजा जाता है।  हवाला कारोबार करने वाले व्यक्ति अपने ग्राहकों से कोई भी असुविधाजनक प्रश्न नहीं पूछते क्योंकि उनको पता होता है कि उनके ग्राहक अधिकांशतः अपराध जगत से जुड़े हुए ही लोग हैं।  सामान्यतः ये धन बैंकों के माध्यम से आसानी से नहीं भेजा जा सकता क्योंकि बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने खाताधारकों की सूक्ष्म जांच – पड़ताल करेंगे और सभी आवश्यक दस्तावेज़ मांगेंगे। फिर भी, यदि कुछ लापरवाह किस्म के, या अपराधियों की तुलना में कम अक्ल रखने वाले बैंक अधिकारी हों तो वह इन अपराधियों के झांसे में आ जाते हैं और अनजाने में ही,  गन्दे धन को खाते में जमा करने या एक शहर से दूसरे शहर में, एक खाते से दूसरे खाते में भेजने के अपराधी बन जाते हैं।  यदि आतंकवादी समूह को बड़ी राशि जैसे कुछ करोड़ रुपये इधर से उधर भेजने हों तो कई बार वह अपने संगठन से जुड़े सैंकड़ों लोगों की भी सहायता लेते हैं ताकि बड़ी राशि को कई सारे टुकड़ों में बांट कर अलग – अलग खातों के माध्यम से भेजा जाये ताकि उस पर रिज़र्व बैंक की नज़र न पड़े।  एक व्यक्ति या संस्था वेतन के नाम पर सैंकड़ों खातों में इतनी धनराशि अंतरित करती है जिस पर संदेह न हो।  उसके बाद, वे सैंकड़ों खाताधारक अपने अपने खाते से वह धन वांछित खाते में भेजना आरंभ कर देते हैं।  ये खाताधारक अलग – अलग राज्यों में, अलग – अलग शहरों में, अलग अलग बैंकों को अलग – अलग शाखाओं में अपने खाते खोलते हैं और प्रत्यक्षतः एक का दूसरे से कोई संबंध दिखाई नहीं पड़ता है।  इस काम के लिये कुछ लोग एन.जी.ओ. भी बना लेते हैं ताकि इस प्रकार के आर्थिक लेन-देन को संस्था को दिया गया चन्दा या दान बताया जा सके।  कई बार बैंक शाखाओं में कार्यरत बैंककर्मी अपने उच्च अधिकारियों द्वारा दिये गये जमाराशि के लक्ष्यों को पूरा करने के लिये ऐसे खाते खोलने को भी तत्पर हो जाते हैं जिनमें शक करने के पर्याप्त कारण मौजूद होते हैं परन्तु नया खाता मिलने के लालचवश या लापरवाही के कारण ये अधिकारी चुप रह जाते हैं और जान-अनजाने ही भीषण आपराधिक घटना में सहयोगी बन जाते हैं।

एक और उदाहरण देखें!  कल्पना कीजिये कि किसी अपहरणकर्त्ता ने फिरौती के रूप में बड़ी रकम नकद रूप में प्राप्त की है। पुलिस की गिरफ्त में आने से बचने के लिये उसका प्रयास रहेगा कि वह शीघ्र से शीघ्र फिरौती से प्राप्त रकम को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दे व उसको इस रूप में ले आये कि उसका उपयोग संभव हो सके।  ऐसे में उसका प्रयास रहेगा कि वह इस रकम को एक या अधिक बैंकों के माध्यम से अन्य शहरों में स्थानांतरित कर दे ताकि यह न पता चल सके कि वह अपराध से कमाया हुआ धन है। इसके लिये नकली के.वाय.सी. (KYC) दस्तावेज़ तैयार कर के बैंकों में खाते खोलना, अनेकों नकली कंपनियां बनाना और विभिन्न बैंकों में उनके बैंक खाते खोल कर धनराशि को बार – बार एक खाते से दूसरे खाते में घुमाया फिराया जाता है ताकि उस राशि का मूल स्रोत गुम हो जाये और कुछ समय के बाद यह न पहचाना जा सके कि ये धन आया कहां से था।  इस कार्य में अपराध जगत से जुड़े हुए कुछ होशियार सी.ए. भी भारी भरकम फीस या अपने हिस्से के लालच में उनके सहायक बन जाते हैं।

विभिन्न अपराधों से प्राप्त होने वाली आमदनी में अपहरण की फिरौती, ब्लैकमेल से प्राप्त धन, अवैध हथियारों की बिक्री, जुआ, स्मगलिंग, नशे का कारोबार आदि भी शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष बैंकों के माध्यम से 600 अरब डॉलर गंदा धन साफ किया जा रहा है। स्वाभाविक रूप से ये वह राशि है जिसका बैंकों को भी पता नहीं चल पाता कि ये अपराध से जुड़ा हुआ धन है।   उनको पता न लग पाने की वज़ह ये है कि आपराधिक कार्य करने वाले ऐसे व्यक्तियों को सरकार के, भारतीय रिज़र्व बैंक के और विभिन्न बैंकों के सभी दिशानिर्देशों की, औपचारिकताओं की भली प्रकार जानकारी होती है और अधिकांशतः वह बैंक अधिकारियों से कहीं अधिक तेज़ दिमाग़ और बेहतर जानकारी रखते हैं। लालची या लापरवाह बैंक अधिकारियों को मूर्ख बनाना उनको भली भांति आता है। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों की छोटी बैंक शाखाओं को विशेष रूप से इस काम के लिये उपयोग किया जाता है क्योंकि वहां पर मौजूद अधिकारियों को इस अपराध की भयावहता और व्यापकता का उतना बेहतर अंदाज़ नहीं होता है।

हवाला कारोबार और अपराधियों को अभी कुछ मास पूर्व की गयी नोटबन्दी से बहुत बड़ा झटका लगा था क्योंकि उनके पास मौजूद 500 व 1000 रुपये के नोट अचानक ही रद्दी के टुकड़े बन कर रह गये।  जैसा कि समाचार पत्रों में समाचार प्रकाशित होते रहे,  कुछ गिने-चुने लोग अपने संपर्कों का सहारा लेकर अपने कुछ अवैध धन को अनौपचारिक रूप से बदल कर नयी करेंसी लेने में सफल भी हुए पर फिर भी सरकार काले धन के व्यापार को तगड़ा झटका देने में बहुत हद तक सफल रही है। यह देखना स्वयं में बड़ा रोचक रहा कि अपने आप को दुनिया का सबसे ईमानदार व्यक्ति घोषित करने वाले कुछ नेता नोटबन्दी के इस फैसले से इतने अधिक दुष्प्रभावित हुए कि विक्षिप्त व्यक्तियों के जैसा व्यवहार करने लगे और  केन्द्र सरकार और देश के प्रधानमंत्री को गालियां देने लगे।

स्पष्ट ही है कि कालाधन और गन्दा धन दो अलग-अलग समस्याएं हैं।  जहां काला धन हमारे देश की अर्थव्यवस्था को कुप्रभावित करता है, वहीं गन्दा धन देश की सुरक्षा पर ही खतरा है। वैध स्रोतों से प्राप्त की गयी आय को कर बचाने के लिये छिपाने की प्रवृत्ति पर काबू पाना सरल है और सच तो ये है कि इस मनोवृत्ति को जन्म देने के लिये सरकार की नीतियां भी बहुत हद तक दोषी हैं।  आयकर की अविवेकपूर्ण दरें एक सामान्यतः ईमानदार नागरिक को भी अपनी वैध आय को छिपाने के लिये प्रोत्साहित करती हैं।  सरकार अपनी नीतियों में वांछित परिवर्तन करके इस समस्या को स्वयं हल कर सकती है।  परन्तु काला धन भ्रष्ट तरीकों से भी कमाया जाता है जिसमें सरकार के मंत्रियों के अलावा सांसद, विधायक, अधिकारी व कर्मचारी, व्यापारी और उद्यमी, हर कोई शामिल हैं।  जब एक ठेकेदार सड़क निर्माण का ठेका सरकार से लेता है तो उसे अपने बिल की राशि में न जाने कितने सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को दी जाने वाली रिश्वत का भी इंतज़ाम करके रखना होता है।  उसके बाद वह निश्चिन्त होकर ऐसी सड़क बना सकता है जो भले ही, छः महीने या एक बरसात भी न झेल सके, पर उसके बिल तुरन्त पास हो जाते हैं।

काला धन, चाहे वह वैध स्रोतों से कमाई हुई अवैध, अघोषित आय हो, या भ्रष्टाचार से एकत्र किया गय  धन हो, नकदी / जेवरात / भू संपत्ति आदि के रूप में रखा हुआ मिलता है, या विदेश यात्राओं पर, शान-शौकत दिखाने में और ऐय्याशी में खर्च किया जाता है।  आधार कार्ड से सारे बैंक खातों को जोड़ना, बड़े लेन-देन में नकदी के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाना, डिजिटल लेन-देन को प्रोत्साहित करना, आयकर की दरों को विवेकपूर्ण बनाना, पैन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना ऐसे ही कुछ उपाय हैं जिनसे काले धन के सृजन पर सार्थक रोक लगाई जा सकती है और हम आशा कर सकते हैं कि आने वाले कुछ वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था में काले धन की मात्रा में काफी कुछ कमी आयेगी।

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